इसके बाद सीसीटीवी कैमरे लगाने के दिल्ली सरकार के प्रस्ताव पर भी मई में विवाद खड़ा हो गया। उपराज्यपाल ने जरूरी बदलाव की सिफारिश करते हुए प्रस्ताव दिल्ली सरकार को लौटा दिया। इसके बाद मुख्यमंत्री समेत सभी मंत्रियों ने उपराज्यपाल कार्यालय के बाहर करीब तीन घंटे तक धरना दिया। इससे पहले फरवरी में मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ मुख्यमंत्री आवास में मध्य रात्रि को हुई कथित मारपीट के मामले में अधिकारी व सरकार आमने-सामने आए। अधिकारियों ने मंत्रियों की बैठकों में जाने से इनकार कर दिया।
अधिकारियों की हड़ताल की बात कहते हुए मुख्यमंत्री ने बीते दिनों अपने मंत्रियों के साथ 9 दिन तक राजनिवास में धरना दिया। पार्टी ने दिल्ली में रैली भी निकाली। मुख्यमंत्री की मांग थी कि उपराज्यपाल हड़ताल खत्म कराने के साथ डोर स्टेप डिलीवरी योजना को मंजूर करें। इस बीच, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया व मंत्री सत्येंद्र जैन ने अनशन भी किया। दोनों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। अरविंद केजरीवाल ने उस वक्त आरोप लगाया था कि उपराज्यपाल का व्यवहार वायसराय की तरह है। उन्हें वह मुख्यमंत्री से मुलाकात करने तक का वक्त नहीं मिला।
कब क्या हुआ
दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच टकराव, कब क्या हुआ
जून 2015 : दिल्ली सरकार ने बतौर एसीबी प्रमुख एमके मीना की नियुक्ति की वैधता को हाईकोर्ट में किया चेलेंज
अप्रैल 2016 : आप सरकार ने हाईकोर्ट में उपराज्यपाल के अधिकार को चुनौती देने वाली याचिका को बड़ी बेंच में ट्रांसफर करने की अपील की।
अगस्त 2016 : हाईकोर्ट ने दिया आदेश, उपराज्यपाल दिल्ली को प्रशासनिक प्रमुख, कैबिनेट का फैसला मानने को बाध्य नहीं।
सितंबर 2016 : सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर दिल्ली सरकार की तरफ से हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर 6 याचिकाओं पर मांगा जवाब।
फरवरी 2017 : सुप्रीम कोर्ट ने मामले को संवैधानिक बेंच को भेजा।
दिसंबर 2017 : सुप्रीम कोर्ट ने फैसला रिजर्व किया।
जुलाई 2018 : सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा कि उपराज्यपाल के पास फैसले लेने का स्वतंत्र अधिकार नहीं। वह सरकार की सलाह मानने को बाध्य।