नेतृत्व की तरफ से सीधा-सपाट और एक सा संदेश न मिलने से प्रदर्शनकारी अपने हिसाब से इन सड़कों पर दिन भर प्रदर्शन, नारेबाजी करते दिखते हैं। कई बार यह पुलिस के साथ कहासुनी व झड़प की वजह भी बनी है। यह सड़कें भी सोमवार के संसद मार्च से बंद पड़ी हैं। हैवी ट्रैफिक के बीच लोगों को दूसरे रास्तों से सफर करना पड़ रहा है।
असल में सीजेपी से पहले हुए आंदोलनों में टॉलस्टाय मार्ग से अशोक रोड तक जंतर मंतर रोड पर भीड़ समा जाती थी। फिर चाहे वह अन्ना सरीखा बड़ा आंदोलन ही रहा हो। आम आदमी पार्टी की स्थापना और उसके शुरुआती आंदोलनों के वक्त भी बड़ी संख्या में मौके पर लोगों के पहुंचने के बावजूद भी फैलाव इस कदर नहीं हुआ था। इसकी बड़ी वजह मंच की लोकेशन थी।
इन आंदोलनों में मंच या तो जनता दल (यू) दफ्तर के बगल होता था या टॉलस्टाय मार्ग व जंतर मंतर रोड की क्रासिंग पर। वहीं, जंतर मंतर रोड के करीब डेढ़ किमी लंबे हिस्से में दर्शकों के बैठने का इंतजाम होता था। जगह-जगह लगे माइक व एलईडी स्क्रीन से दूर बैठे लोग भी मंच से जुड़े होते थे।
दूसरी तरफ सीजेपी के आंदोलन में जंतर मंतर के छोटे से हिस्से में प्रदर्शन की इजाजत है। इससे मंच के सामने की जगह अमूमन भरी रहती है। वहीं, मंच की फेसिंग कनॉट प्लेस की तरफ होने से प्रदर्शनकारी वाया संसद मार्ग व जनपथ टॉलस्टाय मार्ग से प्रदर्शन स्थल पर जाने की कोशिश करते हैं। लेकिन मंच के सामने की जगह पूरी तरह भरी होने से वहां लोग खड़े भी नहीं हो पा रहे और उनको वापस लौटना पड़ता है। फिर, तीनों सड़कों पर फैलकर लोग नारेबाजी करते रहते हैं।
इस बीच पुलिस की टोका-टाकी कई बार उनको नागवार गुजरती है। इसमें किसी तरफ से भड़काऊ बयान आने से हालात हाथ से निकल जाते हैं।