- कोविड के दौरान गरीब किरायेदारों से किराया न वसूलने को लेकर अदालत कर रही थी सुनवाई
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि मुख्यमंत्री की ओर से प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए आश्वासन या वादे को बिना किसी औपचारिक नीति, अधिसूचना या कानूनी आधार के, अदालत के माध्यम से लागू नहीं कर सकते। कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा मार्च 2020 में कोविड लॉकडाउन के दौरान गरीब किरायेदारों के किराये का भुगतान करने के वादे को कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं माना।
न्यायमूर्ति सी. हरिशंकर और न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला की खंडपीठ ने सरकार की अपील को स्वीकार करते हुए एकल न्यायाधीश के आदेश को पलट दिया। मामला दिल्ली सरकार बनाम नजमा से संबंधित है। वर्ष 2020 में लॉकडाउन के चौथे दिन 29 मार्च को अरविंद केजरीवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि गरीब और जरूरतमंद किरायेदारों से मकान मालिक किराया न वसूलें। अगर कोई किरायेदार गरीबी के कारण किराया नहीं दे पाएगा तो सरकार उसकी ओर से भुगतान करेगी। एक याचिकाकर्ता (नजमा समेत अन्य किरायेदारों) ने इस वादे को लागू करने की मांग की थी। एकल न्यायाधीश ने पहले इसे लागू करने के योग्य माना था और सरकार को इस पर निर्णय लेने का निर्देश दिया था। लेकिन, खंडपीठ ने कहा कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए बयान से कोई कानूनी दायित्व नहीं बनता।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह वादा बिना पूर्ण मनन के लगता है और इसमें कोई दस्तावेजीकरण (जैसे ऑफिस मेमोरेंडम) नहीं था। हालांकि, कोर्ट ने लॉकडाउन के दौरान डीडीएमए (दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण) के आदेश का समर्थन किया, जिसमें गरीब प्रवासी किरायेदारों से किराया वसूली पर रोक लगाई गई थी।