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Delhi NCR News: सीआईएसएफ अधिकारी को 25 साल बाद मिला न्याय, यौन उत्पीड़न के आरोप से बरी

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- अधिकारी ने अपनी अपील में प्रतिष्ठा बहाली की मांग की थी किसी मौद्रिक मुआवजे की मांग नहीं रखी थी
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली।
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) अधिकारी की 25 साल पुरानी लड़ाई में राहत दी है है। कोर्ट ने 1999 में लगाए गए झूठे यौन उत्पीड़न के आरोपों के आधार पर 2005 में जारी अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को रद्द कर दिया। अब 72 वर्षीय इस पूर्व कमांडेंट को सेवानिवृत्ति की सामान्य आयु तक सेवा में रहने वाला मानते हुए पेंशन और अन्य लाभों का संशोधन किया जाएगा। 1976 में सीआईएसएफ में शामिल हुए इस अधिकारी को 1998 में असिस्टेंट कमांडेंट पद पर प्रमोशन मिला था। 1999 में एक महिला कांस्टेबल ने उन पर अनुचित टिप्पणियां करने, अवैध संबंध बनाने की कोशिश करने और दो अन्य महिलाओं के साथ यौन दुराचार के आरोप लगाए थे। अधिकारी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया और कहा कि महिला ने यह शिकायत बदले की भावना से की थी, क्योंकि उन्होंने उसकी ड्यूटी में लापरवाही पर चेतावनी दी थी।
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पहली दो जांचों में मिली थी क्लीन चिट
दो प्रारंभिक जांचों में अधिकारी को क्लीन चिट मिली, लेकिन तीसरी जांच (एक महिला अधिकारी द्वारा) में शिकायत को सही ठहराया गया, जिसके बाद अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू हुई। 2005 में डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल (डीआईजी) ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश जारी किया, हालांकि स्पेशल सेक्रेटरी ने इसका विरोध किया था। अधिकारी ने 2006 में हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें केवल अपनी प्रतिष्ठा की बहाली मांगी, कोई मौद्रिक मुआवजा नहीं। न्यायमूर्ति दिनेश मेहता और न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव की डिवीजन बेंच ने 19 दिसंबर 2025 को फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा, लगभग 25 साल बीत चुके हैं और याचिकाकर्ता 72 साल के हो चुके हैं। हम कम से कम उनकी इज्जत तो बहाल कर सकते हैं, जो अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश से नष्ट हो गई थी।
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