हाईकोर्ट ने सेंट स्टीफंस कॉलेज की दाखिला कमेटी में सुप्रीम काउंसिल के ईसाई सदस्य को शामिल किए जाने के मुद्दे पर स्थगन आदेश देने से बुधवार को इंकार कर दिया। कॉलेज के तीन प्रोफेसरों ने याचिका दायर कर इसे कॉलेज प्रशासन में सुप्रीम काउंसिल का दखल बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की थी।
न्यायमूर्ति अनु मल्होत्रा ने प्रोफेसर नंदिता नारायण व अन्य की याचिका पर सुनवाई के बाद कॉलेज के वकीलों की दलीलों से सहमति जताते हुए दाखिला कमेटी में ईसाई सदस्य के शामिल किए जाने पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। कोर्ट ने याचिका पर अगली सुनवाई के लिए 2 जुलाई की तारीख तय की है। सेंट स्टीफंस में दाखिले के लिए साक्षात्कार 4 जुलाई तक चलेंगे।
कोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि सेंट स्टीफंस कॉलेज के संविधान के मुताबिक सुप्रीम काउंसिल कॉलेज के प्रशासनिक व प्रतिदिन के कार्यों में दखल नहीं दे सकता और दाखिला प्रक्रिया प्रशासनिक कार्य हैं।
दाखिले के लिए साक्षात्कार के समय प्रधानाचार्य के साथ संबंधित विभाग के प्रमुख व अन्य शिक्षक होता है। यह नियम लंबे समय से चला रहा है। इस पैनल में शिक्षाविदों के अलावा किसी अन्य को शामिल नहीं किया जा सकता। यह दाखिला प्रक्रिया में सुप्रीम काउंसिल का सीधा दखल है।
याचिकाकर्ता की दलीलों को खारिज करते हुए सेंट स्टीफंस कॉलेज की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ए मरियारपुथम व रोमी चाकू ने कहा कि सेंट स्टीफंस कॉलेज एक अल्पसंख्यक ईसाई शिक्षण स्थान है और उसमें 50 फीसदी सीटें ईसाई छात्रों के लिए आरक्षित हैं। इसका गठन एक सोसाइटी ने किया है, जो चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया की एक संस्था है।
कॉलेज का गठन ईसाई धर्म की शिक्षा के लिए किया गया है और इसके चरित्र को बचाने के लिए सुप्रीम काउंसिल को हर कदम उठाने का अधिकार है तथा कॉलेज का प्रशासन गवर्निंग काउंसिल चलाती है।
कॉलेज के वकीलों ने कहा कि सुप्रीम काउंसिल ने इस सदस्य को केवल ईसाई छात्रों के साक्षात्कार में शामिल होने के लिए मनोनीत किया है और वह कोई बाहरी व्यक्ति नहीं है। वह सुप्रीम काउंसिल का सदस्य होने के साथ ही गवर्निंग काउंसिल का भी सदस्य है। इसलिए उसे दाखिला प्रक्रिया में शामिल किया जाना किसी भी तरह गलत नहीं है।