आत्मविश्वास सिखाते हैं
क्रैचर चलाने वाली महिला सदस्य ममता शुक्ला बताती हैं कि हम रोज 40 से ज्यादा मजदूरों के बच्चों को संभालते हैं। उन्हें सिर्फ पढ़ना नहीं, सफाई, खेल और आत्मविश्वास भी सिखाते हैं। बहुत बच्चे पहली बार पेंसिल पकड़ते हैं।
नवलेश का सपना बेटी को ‘मैडम’ बनाना
नवलेश, जो मूल रूप से बिहार के मधेपुरा जिले से हैं, मयूर विहार में पेंटिंग का काम करते हैं। उनकी 8 साल की बेटी संगीता अब एक एनजीओ स्कूल में चौथी कक्षा में पढ़ती है। नवलेश कहते हैं, कि पहले वो मेरे साथ पेंट का बाल्टी उठाती थी, अब कॉपी-किताब उठाती है। जब वो कहती है कि बड़ी होकर ‘मैडम’ बनेगी, तो लगता है मेरी जिंदगी का रंग बदल गया।
‘अब बच्चों के चेहरे में सुकून दिखता है’
लक्ष्मी, जो पिछले सात साल से मजदूर बस्तियों में बच्चों के साथ काम कर रही हैं, बताती हैं, शुरुआत में बच्चे हमसे डरते थे। उन्हें लगता था कि हम भी उन्हें काम पर भेजने आए हैं। लेकिन जब हमने उन्हें पहली बार स्लेट और रंग दिए, तो उनके चेहरे पर जो मुस्कान थी, वही हमारी जीत थी
मेरा बेटा अब कबाड़ी नहीं पुलिस बनेगा
जहांगीरपुरी की झुग्गी में रहने वाले मुकेश कुमार और उनकी पत्नी मीणा दोनों सफाईकर्मी हैं। उनका बेटा कृष्ण (6) पहले दिन भर सड़क पर कबाड़ बीनता था। एक दिन एनजीओ की सड़क शिक्षा बस उनके इलाके में आई और वहीं से कृष्ण की पढ़ाई की शुरुआत हुई। अब जब कृष्ण खुद कहता है कि वो ‘पुलिस बनकर बस्ती साफ करेगा’।