- भारत रंग महोत्सव के बीच बचपन की संवेदनाओं का रंगमंचीय उत्सव, 620 नन्हे बच्चे ले रहे भाग
संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली।
मंच पर खड़ा एक बच्चा है थोड़ा सहमा हुआ, आंखों में उत्सुकता और आवाज में झिझक। सामने रोशनी है, दर्शक हैं, और भीतर एक अनकही कहानी। यही वह क्षण है, जहां जश्न-ए-बचपन बच्चों को अभिनय से पहले खुद को व्यक्त करना सिखाता है। कक्षा में चुप रहने वाले कई बच्चे जब मंच पर आते हैं, तो उनकी आंखों में डर नहीं, कहानी होती है। चल रहे 25वें भारत रंग महोत्सव के बीच राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की तरफ से आयोजित जश्न-ए-बचपन 2026 बच्चों के लिए सिर्फ नाट्य मंच नहीं, बल्कि भावनाओं को समझने और कहने का सुरक्षित स्थान बन गया है। यहां बच्चे अभिनय के जरिये बोलना, सुनना, महसूस करना और अपनी बात कहने का साहस सीख रहे हैं। जहां एक ओर चल रहा 25वां भारत रंग महोत्सव भारत और दुनिया के रंगमंचीय संवाद का मंच बना हुआ है, वहीं इसके बीच जश्न-ए-बचपन 2026 बच्चों को नाट्य कला के जरिये अपने भाव, विचार और कल्पनाओं को अभिव्यक्त करने का आत्मविश्वास सिखा रहा है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के थिएटर-इन-एजुकेशन विभाग यानी ‘संस्कार रंग टोली’ की तरफ से आयोजित जश्न-ए-बचपन 2026 का शुभारंभ बृहस्पितवार को मेघदूत मुक्ताकाश मंच पर हुआ। यह महोत्सव विश्व के सबसे बड़े रंगमंच उत्सव भारत रंग महोत्सव 2026 का अभिन्न हिस्सा है और 18 फरवरी तक 21 दिनों तक चलेगा।
24 नाट्य समूहों के 620 बच्चे ले रहे भाग-
इस 15वें संस्करण में देशभर से आए 24 नाट्य समूहों के 620 बच्चे और युवा कलाकार भाग ले रहे हैं, जो 24 नाटकों के माध्यम से अलग-अलग भाषाओं, लोकशैलियों और रंगमंचीय रूपों में प्रस्तुति दे रहे हैं। इन प्रस्तुतियों में बच्चे न केवल अभिनय कर रहे हैं, बल्कि अपने डर, जिज्ञासा, खुशी, संघर्ष और सपनों को मंच पर जीते हुए दिखा रहे हैं। उद्घाटन समारोह में प्रसिद्ध फिल्म निर्माता कृष्णिका लुल्ला मुख्य अतिथि रहीं।
जश्न-ए-बचपन बच्चों को बिना भय के अपनी बात कहने का मंच देता है। बच्चे बिना बनावट के सृजन करते हैं और वही सच्ची कला की आत्मा है।
-कृष्णिका लुल्ला, फिल्म निर्माता
जश्न-ए-बचपन केवल बच्चों का नाट्य महोत्सव नहीं, बल्कि यह समाज और आने वाली पीढ़ी के बीच रचनात्मक संवाद का माध्यम है।
-चित्तरंजन त्रिपाठी, निदेशक, एनएसडी