सब-क्रिटिकल बॉयलर ज्यादा पानी की मांग करते हैं जबकि सुपर क्रिटिकल इंजन पानी की खपत कम करते है। नई गाइडलाइन में सुपर क्रिटिकल इंजन की तकनीकी को देखते हुए जल उपभोग की सीमा घटाने की मांग हो रही थी।
चीन और दक्षिण अफ्रीका के पुराने पावर प्लांट बेहतर
लीगल इनिशिएटिव फॉर फारेस्ट एंड एनवायरमेंट (लाइफ) की गीतांजलि श्रीधर ने बताया कि वैश्विक स्तर पर चीन और दक्षिणी अफ्रीका के पुराने तकनीकी वाले सब-क्रिटिकल पावर
प्लांट जल उपभोग के मामले में भारत के सुपर क्रिटिकल पावर प्लांट से बेहतर हैं। चीन में सब-क्रिटिकल 600 मेगावाट प्लांट में वेट कूलिंग टावर सिर्फ 1.96 घन मीटर प्रति मेगावाट घंटा जल उपभोग करते हैं। वहीं, दक्षिण अफ्रीका में पावर प्लांट के जल उपभोग की सीमा 2.32 घन मीटर प्रति मेगावाट घंटा है।
थोड़ी कटौती से पूरी हो सकती है 44 हजार लोगों के लिए जलापूर्ति
यदि 500 मेगावाट क्षमता वाले पावर प्लांट में जल उपभोग की सीमा 0.5 घन मीटर प्रति मेगावाट घंटा भी बढ़ाया जाता है तो इसका मतलब है कि संबंधित मेगावाट 21,90,000 घन मीटर पानी पूरे वर्ष में ज्यादा इस्तेमाल करेगा। पूरे वर्ष एक वक्ति पर औसत घरेलू जल खपत 49.275 घन मीटर होता है। ऐसे में आप इतने पानी से 44 हजार लोगों के पानी की जरूरत को पूरा कर सकते हैं। भारत में वैसे ही जलसंकट गहराने लगा है।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट (सीएसई) ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि दिल्ली-एनसीआर के 300 किलोमीटर की परिधि में मौजूद सभी पावर प्लांट पुराने तकनीकी और
मानकों पर काम कर रहे हैं। इनके उत्सर्जन की वजह से यहां प्रदूषण की समस्या बनी हुई है। वहीं, रिपोर्ट से अलग विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली-एनसीआर के कई इलाके भी जल-संकट की मार झेल रहे हैं।
समुद्री जल के इस्तेमाल की कोई सीमा नहीं
ऐसे थर्मल पावर प्लांट जो समुद्री जल का इस्तेमाल करते हैं उनके लिए न तो कोई जल उपभोग की सीमा है और न ही डिस्चार्ज के लिए कोई अनिवार्य नियम। इससे भी समुद्र में रहने वाले जलीय जीवों और वनस्पतियों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।