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सीबीआई बनाम सीबीआईः राकेश अस्थाना के लिए घूस लेने वाले आरोपी मनोज प्रसाद को मिली बेल

Tue, 18 Dec 2018 05:31 PM IST
दुष्यंत शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सीबीआई - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने मंगलवार को दुबई के इंवेस्टमेंट बैंकर मनोज प्रसाद को जमानत दे दी है। मनोज पर सीबीआई घूसकांड में बिचौलिए की भूमिका निभाने और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के लिए घूस लेने का आरोप है।

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11 दिसंबर को प्रसाद ने मीडिया से बात करते हुए उसके ऊपर सतीश सना द्वारा लगाए गए सभी आरोपों को मानने से इंकार कर दिया था। प्रसाद ने कहा था कि वह कभी भी अस्थाना से मिला ही नहीं है।

कोर्ट में पेशी के वक्त मीडिया से बात करते हुए प्रसाद ने कहा था कि, 'ये सब झूठ है। सब कुछ मनगढ़ंत है। जो भी उन्होंने दावा किया है ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैंने कभी पैसे नहीं लिए और न ही कभी अस्थाना से मिला हूं। मुझे नहीं पता अस्थाना कौन है।'
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राकेश अस्थाना की नियुक्ति को चुनौती देने वाली सुधारात्मक याचिका हो चुकी है खारिज

गुजरात कैडर केआईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना को सीबीआई का विशेष निदेशक नियुक्त करने के केंद्र सरकार के निर्णय को चुनौती देने वाली सुधारात्मक याचिका भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी थी। इससे पहले पुनर्विचार याचिका को भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था।

चीफ जस्टिस रंजन गोगई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कॉमन कॉज द्वारा दायर सुधारात्मक याचिका में मेरिट का अभाव बताते हुए खारिज कर दिया था। चैंबर में हुई इस याचिका पर सुनवाई पर 11 दिसंबर को निर्णय लिया गया था लेकिन शुक्रवार को इसे सार्वजनिक किया गया।

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न घूस मांगी और न ली, इसलिए नहीं बनता भ्रष्टाचार का मामला: अस्थाना

सीबीआई के विशेष निदेशक ने न कभी घूस मांगी और न कभी उन्होंने घूस स्वीकार की। इसलिए उन पर भ्रष्टाचार का कोई मामला नहीं बनता। यह एफआईआर पूरी तरह बदनियती से की गई है। यह दलील बीते शुक्रवार को राकेश अस्थाना के वकीलों ने हाईकोर्ट में उनकी याचिका पर जिरह करते हुए दी। वहीं, आलोक वर्मा के वकील ने कहा कि अस्थाना पर एफआईआर करने के लिए पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया। इसलिए एफआईआर के पीछे बदनियती होने का आरोप पूरी तरह गलत है। 

न्यायमूर्ति नजमी वजीरी के समक्ष राकेश अस्थाना के वकील अमरेंद्र शरण ने कहा कि जब रिश्वत मांगी ही नहीं गई तो भ्रष्टाचार का मामला कैसे बन गया। वहीं, मुकदमा दर्ज करने के लिए अनिवार्य सरकारी अनुमति नहीं ली गई। दूसरी ओर से जिस शख्स सतीश बाबू सना ने मोइन कुरैशी को दो करोड़ रुपये घूस देने की बात जांच अधिकारी व कोर्ट के समक्ष स्वीकार की, उस पर कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया गया।

उन्होंने कहा सीबीआई ने अस्थाना पर 15 अक्तूबर 2018 की रात 8 बजे एफआईआर दर्ज की थी, जबकि उसी दिन केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) ने सीबीआई को पत्र लिखकर किसी भी सीबीआई अधिकारी पर सरकारी अनुमति के बिना एफआईआर दर्ज न करने का निर्देश दिया था। एफआईआर करने से पहले प्रारंभिक जांच की जाती है, वह भी नहीं की गई। 

याची की दलीलों का जवाब देने के लिए एएसजी गौतम बनर्जी ने समय मांगा। इस पर कोर्ट ने फटकार लगाते हुए कहा कि यह कानूनी प्रावधान की बात है, इसका जवाब देने के लिए समय क्यों चाहिए।              
सीबीआई की ओर से अधिवक्ता राजदीपा बेहूरा ने कहा कि भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए सरकारी अनुमति की जरूरत नहीं है। इसके अलावा सीबीआई मैन्युअल में कहीं भी प्रारंभिक जांच (पीई) करना अनिवार्य नहीं है। इसके बिना भी एफआईआर की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट भी अपने एक निर्णय में कह चुका है कि भ्रष्टाचार के मामलों में मैन्युअल को नहीं, बल्कि अधिनियम को प्राथमिकता दी जाएगी।              
सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अमित सिब्बल ने कहा अस्थाना पर एफआईआर करने के लिए सरकारी अनुमति की जरूरत नहीं थी। अस्थाना व अन्य आरोपी अपनी ड्यूटी नहीं कर रहे थे बल्कि उगाही कर रहे थे और उन्होंने बयान में फेरबदल करवाया। यह संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है इसलिए एफआईआर करने के लिए सरकारी अनुमति की जरूरत नहीं थी।

दूसरी ओर हैदराबाद के व्यवसायी सतीश बाबू सना की ओर से जिरह के लिए आए वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने कहा कि वह केस में कई अहम साक्ष्य सामने लाना चाहते हैं। कोर्ट ने कहा वह उनकी दलीलें अगली तारीख पर सुनेगी। केस की अगली सुनवाई के लिए 20 दिसंबर की तारीख तय की गई है।
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