नई दिल्ली।
दिल्ली हाईकोर्ट एक नियमों से जुड़ी याचिका पर विचार कर रहा है। इस याचिका में मुख्य सवाल है कि क्या चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए), कंपनी सेक्रेटरी (सीएस), कॉस्ट अकाउंटेंट और अन्य समान योग्यता वाले गैर-वकील ट्रिब्यूनल में मुवक्किलों की ओर से पेश होकर केस लड़ सकते हैं या नहीं। कोर्ट ने माना कि यह एक बहुत अहम मुद्दा है और इसे अनियमित नहीं छोड़ा जा सकता।
न्यायमूर्ति प्रतिबा एम सिंह और न्यायमूर्ति मधु जैन की डिवीजन बेंच ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) और एसोसिएशन ऑफ टैक्स लॉयर्स की याचिकाओं पर सुनवाई की। एसोसिएशन ऑफ टैक्स लॉयर्स की ओर से सीनियर एडवोकेट राजीव सक्सेना ने तर्क दिया कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत केवल राज्य बार काउंसिल में नामांकित वकील ही अदालतों और ट्रिब्यूनल में प्रैक्टिस कर सकते हैं और बहस कर सकते हैं। गैर-वकीलों द्वारा ऐसा करना एक्ट का उल्लंघन है और धारा 45 के तहत दंडनीय है। उन्होंने कहा कि पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर अकाउंटेंट और यहां तक कि ग्रेजुएट भी ट्रिब्यूनल में पेश हो रहे हैं और अधिकारियों द्वारा अनुमति दी जा रही है, जिसके खिलाफ कई बार प्रतिनिधित्व किया गया लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
दूसरी ओर, चार्टर्ड अकाउंटेंट, कंपनी सेक्रेटरी और कॉस्ट अकाउंटेंट की ओर से तर्क दिया गया कि कंपनी एक्ट की धारा 432 और संबंधित ट्रिब्यूनल के नियमों व प्रैक्टिस डायरेक्शन्स के तहत वे मुवक्किलों का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ये याचिकाएं एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाती हैं कि क्या गैर-एडवोकेट नामांकित व्यक्ति ट्रिब्यूनल में पेश होकर मुवक्किलों की ओर से बहस कर सकते हैं। ऐसे व्यक्ति में चार्टर्ड अकाउंटेंट, कंपनी सेक्रेटरी, कॉस्ट अकाउंटेंट और समान योग्यता वाले अन्य शामिल हैं, जिनके पास एलएलबी डिग्री हो भी सकती है या नहीं।यह मामला कई याचिकाओं (जिनमें सबसे पुरानी 2005 की है) का बैच है। अगली सुनवाई 16 मार्च को निर्धारित की गई है।