सरकार के लाख प्रयास के बावजूद सरकारी स्कूलों में खेलों के स्तर में सुधार देखने को नहीं मिल रहा है। साइबर सिटी के कई राजकीय स्कूलों में खेल के मैदान नहीं है। जहां खेल मैदान हैं, वहां बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। ऐसे में खेल प्रतिभाएं उभर कर सामने नहीं आ रही हैं। इन स्कूलों के खिलाड़ी दूसरे स्कूलों पर निर्भर रहते हैं।
वैसे तो राज्य सरकार ने स्कूलों में खेल मैदान की अनिवार्यता का मापदंड बना रखा है। शारीरिक शिक्षकों के पद भी सृजित कर रखे हैं। प्रत्येक वर्ष स्कूलों के बच्चों की ब्लॉक, जिला व अन्य उच्च स्तर पर प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं, लेकिन हकीकत यह है कि अधिकांश स्कूलों के पास अपने खुद के मैदान नहीं है।
शहर भर में कुल 574 राजकीय स्कूल हैं। सरकारी आंकड़ें बतातेे हैं कि इसमें से 70 प्रतिशत स्कूलों के पास खेल के मैदान हैं, जबकि 30 प्रतिशत स्कूलों के पास नहीं है। जिन स्कूलों में खेल मैदान नहीं है, उनके छात्रों को खेलने के लिए किसी दूसरे स्कूल में ले जाया जाता है।
कई स्कूलों में खेल प्रशिक्षक तक नियुक्त नहीं किए गए हैं। ऐसे में खेल की बारीकियों को सीखने में बच्चे नाकाम हो रहे हैं। स्कूल स्तर पर खेलों की पौध तैयार होने से पहले ही मुरझा रही है।
स्कूल प्रशासन और खेल विभाग की तरफ से दावे तो खूब किए जाते हैं, लेकिन हकीकत यही है कि स्कूल में बच्चों को खेल के नाम पर कुछ भी नहीं मिल रहा है। एक तरफ जहां हरियाणा में खेल महाकुंभ का आयोजन करवाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ स्कूलों में बच्चों को खेल की बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिल पा रही हैं।
लगभग 30 प्रतिशत स्कूलों के पास खेल के मैदान नहीं है। इसके लिए दूसरे स्कूलों से समझौता किया गया है। बच्चे वहां जाकर खेलते हैं। जिन स्कूलों में मैदान नहीं है, उसके लिए शासन स्तर पर बातचीत चल रही है। हमारे यहां प्रतियोगिताएं भी आयोजित होती रहती हैं। जिन स्कूलों में खेल के मैदान हैं, वहां बच्चों के प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षक नियुक्त किए गए हैं।
राम कुमार, डीईईओ, गुरुग्राम