जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव-2016 में एबीवीपी की बढ़त को रोकने के लिए लेफ्ट छात्र संगठन बेशक एक जुट हुए हों, लेकिन उनमें पद बंटवारे को लेकर फूट पड़ गयी है। एआईएसएफ ने आइसा और एसएफआई पर सीट बंटवारे को लेकर धोखा देने का आरोप लगाया है।
वहीं, आइसा का तर्क है कि नौ फरवरी मामले में कन्हैया का नाम आने के चलते एआईएसएफ के पास चुनाव में उतारने के लिए एक भी प्रत्याशी नहीं था, क्योंकि उनका संगठन दो धड़ों में बंट चुका है। हालांकि अब लेफ्ट संगठनों के मतभेदों को लेफ्ट के वरिष्ठ नेताओं ने बैठक कर सुलझा लिया है।
लाल दुर्ग में आइसा और एसएफआई मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। दोनों ने संयुक्त पैनल के चारों सीटों समेत स्कूल काउंसलर के पदों पर भी साझेदारी से प्रत्याशी खड़े किए हैं। आइसा व एसएफआई के संयुक्त पैनल की चारों सीटों पर प्रत्याशी खड़े करने के चलते एआईएसएफ नाराज हो गया।
क्योंकि वह अध्यक्ष पद पर अपना प्रत्याशी खड़ा करना चाहता था। जब साझेदारी से बात नहीं बनी तो एआईएसएफ ने उपाध्यक्ष पद पर पीयूष झा को खड़ा कर दिया। हालांकि पीयूष का नाम एक अपराधिक मामले में है।
ऐसे में लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के तहत ऐसा छात्र चुनाव नहीं लड़ सकता है। पीयूष का नाम आपराधिक मामले में होने के चलते नामांकन पत रद्द हो जाता, उससे पहले ही एआईएसएफ ने उसका नाम चुनाव से यह कहकर हटा लिया कि वे बाहर से लेफ्ट संगठनों के प्रत्याशियों को सहयोग देंगे।
लेफ्ट पार्टियों के चलते मामला सुलझा
आइसा, एसएफआई, एआईएसएफ व डीएसएफ के झगड़े का एबीवीपी को सीधा फायदा होता। क्योंकि यदि सभी संगठन अलग-अलग प्रत्याशी मैदान में उतारते तो वोट बैंक में सेंध लग जाती। इसी के चलते जेएनयू के पूर्व छात्र व वामपंथी नेता सीतराम येचूरी, डी राजा और प्रकाश करात ने अपने छात्र संगठनों को निर्देश दिया कि वे मतभेदों को भूलकर एबीवीपी को हराने पर फोकस करें। इस फूट को भरने के लिए जेएनयू शिक्षक यूनियन के प्रेजीडेंट व लेफ्ट समर्थक प्रो. अजय पटनायक व प्रो. चिनाय समेत कई अन्य ने भी सहयोग दिया।
कन्हैया के नाम से बच रहे थे लेफ्ट संगठन
नौ फरवरी को कैंपस में देश विरोधी नारे लगने के मामले में जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष व एआईएसएफ के पदाधिकारी कन्हैया लेफ्ट संगठनों के बीच फूट का कारण बना। क्योंकि मतदाताओं को रिझाने के लिए कोई भी लेफ्ट संगठन नौ फरवरी मामले पर चूक नहीं करना चाहता था। ऐसे में यदि कन्हैया भी सीधे चुनाव में जुड़ता तो मतदाताओं में गलत संदेश जाता और एबीवीपी इस मुद्दे को भुना सकती था।
आइसा व एसएफआई ने छह दिन में एआईएसएफ से प्रत्याशियों के नाम की लिस्ट देने को कहा था, ताकि विभिन्न पदों पर आपसी साझेदारी से प्रत्याशी खड़े कर सकें। एकमात्र पीयूष झा का नाम दिया, जिस पर आपराधिक मामला दर्ज है। नौ फरवरी के मामले में कन्हैया के चलते एआईएसएफ दो धड़ों में बंट गया है। इसी के चलते कोई भी चुनाव में खड़ा नहीं होना चाहता था।
- सुचेता, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आइसा।
एबीवीपी को रोकने के लिए लेफ्ट छात्र संगठनों में मिलकर चुनाव लड़ने की सहमति बनी थी। लेकिन आइसा व एसएफआई ने संयुक्त पैनल की चार सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े कर दिए। जबकि अध्यक्ष पद पर एक मात्र प्रत्याशी एआईएसएफ खड़ा करना चाहता था। इसके बाद एआईएसएफ ने आइसा व एसएफआई का साथ न देने का फैसला लिया है। लेकिन वरिष्ठ वामपंथी नेताओं की बैठक के बाद अब हम लेफ्ट के छात्र संगठन को नहीं, बल्कि लेफ्ट पार्टी के निर्देशों के तहत प्रत्याशी को देखकर बाहर से सहयोग करेंगे।
- वली उल्ला खादरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, एआईएसएफ।
नौ फरवरी मामले के चलते एबीवीपी को मतदाताओं का साथ मिल रहा है, क्योंकि सीधे तौर पर लेफ्ट संगठन देश विरोधी घटना से जुड़े मुद्दे नहीं उठाना चाहते थे। कैंपस में लेफ्ट संगठनों को एक करने के लिए वामपंथी नेताओं की बैठक तो कई दिनों से चल रही हैं।
- सौरभ शर्मा, पूर्व संयुक्त सचिव व एबीवीपी पदाधिकारी।