दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव में कांग्रेस व भाजपा की छात्र ईकाई एनएसयूआई व एबीवीपी ने भले ही दो-दो सीटों पर विजय प्राप्त कर ली लेकिन इन नतीजों में दूरगामी परिणाम के संकेत मिले है। किसी भी देश की दशा व दिशा वहां के युवा तय करते हैं। इन परिणामों से स्पष्ट हो गया कि युवाओं का ज्यादा देर तक प्रलोभन में नहीं रखा जा सकता।
भाजपा को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि हर बार मोदी लहर का वास्ता देकर युवाओं को आकर्षित नहीं किया जा सकता, बल्कि उनकी उम्मीदों पर खरा भी उतरना होगा।
केंद्र सरकार से छात्र संघ के चुनाव भी प्रभावित होते हैं। जब तक केंद्र में कांग्रेस की सरकार रही छात्र संघ पर एनएसयूआई के प्रत्याशी बढ़त लेते रहे है। पिछले लोकसभा चुनावों में युवाओं ने मोदी पर विश्वास जताया और पूरे देश में सोशल मीडिया पर युवा इस अभियान में चले और मोदी के नेतृत्व पर आस्था जताई।
यही कारण है कि छात्र संघ के चुनावों में चार वर्ष से एबीवीपी का कब्जा रहा। मोदी लहर को विजय का मापदंड बनाकर चुनाव लड़ा जाता रहा और हर बार एनएसयूआई का सूपड़ा साफ होता रहा। प्रदेश भाजपा हो या उसकी छात्र ईकाई, किसी ने भी इन वर्षो में छात्रों के हित में कोई ठोस काम नहीं किया। यही कारण है कि युवाओं ने सबक सिखाने के लिए ज्यादा वोट नहीं किया, बल्कि नोटा का ज्यादा प्रयोग किया। वहीं एनएसयूआई इसी का फायदा उठाते हुए बाजी मार गई।