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आखिर कहां जा रहा है शिक्षा के लिए जारी किया गया बजट : कोर्ट

Tue, 18 Oct 2016 12:04 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
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कोर्ट - फोटो : file photo
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हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार व नगर निगम के स्कूलों में शिक्षकों के 50 प्रतिशत पद रिक्त होने पर हैरानी के साथ नाराजगी भी जताई है। अदालत ने दिल्ली सरकार व निगम के कामकाज पर सवाल उठाते हुए कहा कि शिक्षा मद में जारी बजट आखिर जा कहां रहा है। 
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यह चौंकाने वाली बात है कि सरकारी स्कूलों में इतनी बड़ी संख्या में शिक्षकों की कमी है। कोर्ट ने इस मामले में दिल्ली सरकार व तीनों एमसीडी से जवाब तलब किया है। न्यायमूर्ति मनमोहन ने दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि ऐसा लगता है कि प्रशासन ने कई वर्षों से किसी शिक्षक की भर्ती ही नहीं की है। 

अदालत ने कहा पूरा सिस्टम ही ध्वस्त है, आप केवल आधे स्टाफ से काम कर रहें हैं, उन पर काम का कितना अधिक दबाव होगा। कोर्ट ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह जल्द से जल्द दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (डीएसएसएसबी) के माध्यम से शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया शुरू करें। मामले की सुनवाई 8 दिसंबर तय हुई है।
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पेश मामले में सोशल ज्यूरिस्ट नामक संस्था ने जनहित याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता के वकील अशोक अग्रवाल ने अदालत को बताया कि 2001 में हाईकोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ ने आदेश दिया था कि सरकारी स्कूलों में शिक्षक का एक भी पद रिक्त नहीं होना चाहिए, बावजूद इसके राजधानी के सरकारी स्कूल में बड़ी संख्या में पद रिक्त पड़े हैं। 

मौलिक अधिकारों का हनन
अग्रवाल ने कोर्ट को बताया कि दिल्ली सरकार व तीनों एमसीडी में इस समय शिक्षकों के करीब 26031 (सरकार द्वारा निकाले 9 हजार पद
के अलावा) पद रिक्त हैं। जो कुल शिक्षकों का 50 फीसद है। तकरीबन 1977 स्कूलों में 2,50,591 बच्चे पढ़ते हैं, जिससे उन्हें परेशानी हो रही है। यह छात्रों के मौलिक अधिकारों का हनन है।
 
80 प्रतिशत स्कूलों में प्रिंसिपल नहीं
याची का दावा है कि 80 प्रतिशत सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल नहीं है। जो प्रिंसिपल हैं उन्हें यह कहकर कि उनका पद लॉ ऑफिसर में तब्दील कर दिया गया है, उन्हें कोर्ट के कामकाज में लगा रखा गया है। वहीं, सरकार व डीएसएसएसबी के वकील ने कहा कि विशेष शिक्षकों के पद के लिए विज्ञापन निकाला गया है। जो लोग आए थे उनमें से केवल 89 लोग ही योग्य मिले हैं, जिन्होंने पढ़ाना शुरू भी कर दिया है।
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