हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को सिविल सेवा परीक्षा में ट्रांसजेंडर को शामिल करने के लिए ठोस कदम उठाने का निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश जी.रोहिणी व न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा सहगल की खंडपीठ ने 15 अप्रैल 2014 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में ट्रांसजेंडर को कानूनी मान्यता दी थी।
अदालत ने कहा कि सरकार को इस मुद्दे पर तुरंत काम करना होगा।केंद्र सरकार की तरफ से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल संजय जैन ने अदालत को बताया कि उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में ट्रांसजेंडर को तीसरे लिंग के रूप में प्रमाणित करने वाली एजेंसी का नाम, ट्रांसजेंडर की परिभाषा आदि बातें स्पष्ट करने का आग्रह किया था।
उन्होंने कहा कि जून में अदालत ने उसका निपटारा कर दिया है ।उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कर दिया है कि लेसबियन, बाईसेक्सुअल थर्ड जेंडर में नहीं आते हैं। जब तक याचिका लंबित थी तब तक नियमों में संशोधन नहीं हो सकता है।
अब याचिका का निपटारा होने के बाद वह इसमें संशोधन कर देंगे। अदालत 23 मई 2015 यूपीएससी द्वारा सिविल सेवा परीक्षा के लिए जारी नोटिस को रद्द करने की मांग संबंधी याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका का निपटारा करते हुए अदालत ने कहा कि नोटिस का समय बीत चुका है।
पेश मामले में अधिवक्ता जमशेद अंसारी ने जनहित याचिका दायर की थी। याचिका में लिंग पात्रता मानदंड पर यूपीएससी द्वारा सिविल सेवा परीक्षा के लिए जारी नोटिस को खारिज करने का आग्रह किया है।
याचिका में गुहार लगाई गई है कि सिविल सेवा परीक्षा आवेदन फॉर्म में विकल्प के रूप में ट्रांसजेंडर को भी शामिल किया जाए। याचिका में बताया गया कि यह परीक्षा 23 अगस्त 2015 को होनी है। परीक्षा के लिए आवेदन करने की आखिरी तारीख 19 जून है।
आवेदन फॉर्म में तीसरे विकल्प के रूप में ट्रांसजेंडर को शामिल नहीं किया गया है, जो गलत है। याचिका में कहा गया था कि अगर सिविल सेवा परीक्षा में ट्रांसजेंडरों को बैठने का मौका दिया जाता है तो पूरे ट्रांसजेंडर समाज के लिए यह काफी फायदेमंद होगा। चूंकि हमेशा से यह लोग समाज से अलग-थलग रहे हैं। सरकारी नौकरियों में इन्हें स्थान नहीं दिया जाता है। यह लोग समाज में पिछड़ेपन से ग्रसित हैं।