जिस शहर की आधुनिकता, चमक-दमक और औद्योगीकरण का श्रेय हरियाणा सरकार लेती है, उसमें उसका योगदान नाम मात्र का है। यहां जो कुछ भी अच्छा और अंतरराष्ट्रीय स्तर का दिखाई दे रहा है, वह निजी क्षेत्र की बदौलत है।
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शहर के जिस हिस्से में निजी क्षेत्र का योगदान नहीं है, वहां की हालत बद से बदतर होती जा रही है। ऐसे क्षेत्र सरकार की लचर व्यवस्था का नमूना हैं। इस समय दो गुड़गांव बने हुए हैं।
एक वो जिसे निजी क्षेत्र ने विकसित कर वैश्विक स्तर का सुविधा संपन्न बना दिया है। दूसरा वह जो सरकार पर निर्भर है, जिसमें समस्याएं ही समस्याएं हैं।
विदेशों में हुई एनसीआर के शहर की बदनामी
- फोटो : अमर उजाला
गुड़गांव के विकास के दावों की यह पोल खोली है ब्रिटेन के प्रतिष्ठित अखबार द गार्जियन ने। इसमें शहर के विकास और सरकारी तंत्र की मंशा पर कई सवाल उठाए गए हैं, जिससे विदेशों में शहर की बदनामी हुई है।
अखबार ने तो यहां तक लिखा है कि अगर गुड़गांव से निजी क्षेत्र के काम को अलग रखकर सोचा जाए तो सरकारी मशीनरी बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं करवा पा रही है।
गड्ढों वाली सड़कें, खराब पावर इंफ्रास्ट्रक्चर, सीवरेज-ड्रेनेज का अभाव और पेयजल संकट से जूझ रहे लोग सरकारी तंत्र पर बड़ा प्रश्न चिह्न लगा रहे हैं। आधुनिक गुड़गांव को निजी क्षेत्र ने अपने दम पर चमकाया है।
उसने सड़क, सीवर, ड्रेनेज, बिजली, जलापूर्ति आदि में अपने रिहायशी व कमर्शियल क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाया है। सबसे अधिक रोजगार निजी क्षेत्र ने मुहैया करवाए हैं। अगर इसकी तुलना सरकार के कामकाज से की जाए तो बड़े-बड़े दावे करने वाली सरकार कहीं नहीं ठहरती।
ऐसे हैं दो गुड़गांव : निजी और सरकारी
- फोटो : अमर उजाला
गुड़गांव भले ही विश्व स्तर का शहर माना जाता है, लेकिन द गार्जियन लिखता है कि शहर में जहां देखो, वहीं सूअर देखने को मिलते हैं। बता दें कि नगर निगम ने सूअरों को हटाने के लिए विशेष अभियान चलाया था। धारा-144 तक लगा दी थी, लेकिन अब तक सूअर नहीं खत्म हुए। यहां सूअरों और बंदरों का आतंक है।
-एक तरफ ऐसा शहर है, जिसमें पढ़े-लिखे और प्रोफेशनल, विशेष कार्यों में दक्ष और धनाढ्य लोग हैं। दूसरी ओर झुग्गी-झोपड़ियां और प्रवासी श्रमिक हैं।
-एक तरफ गोल्फ कोर्स, चमचमाती बिल्डिंगें और मॉल्स हैं तो दूसरी ओर सरकार की नाकामी का नमूना पेश करते कूड़े-कचरे के ढेर हैं। सरकारी सड़कें टूटी हुई हैं। जगह-जगह पानी की लाइनों में लीकेज दिखता है।
-अखबार के मुताबिक सरकारी कर्मचारी और अफसर काम न करने के लिए जाने जाते हैं। भ्रष्टाचार का बोलबाला है। नौकरशाही ढीली है। जो काम निजी कंपनियां एक घंटे में करती हैं, उसे सरकारी तंत्र एक माह में करता है।
-सरकारी तौर पर सीवरेज सिस्टम का बहुत अभाव है। जबकि निजी क्षेत्र ने सीवरेज के सेफ्टी टैंक बना रखे हैं। उनके पास अपने फायर सेफ्टी सिस्टम हैं।
-पुराने गुड़गांव की हालत तो बहुत ही खराब है। यहां गरीबों को पीने का साफ पानी भी नहीं मिल पा रहा है। साफ-सफाई का बेहद अभाव है।
-गुड़गांव में प्रति व्यक्ति आय प्रतिमाह 4.46 लाख रुपये है।
-गुड़गांव में 250 फॉर्चून-500 कंपनियां हैं।
-दुनिया के बीपीओ कर्मचारियों का 5 फीसदी वर्क फोर्स है यहां।
-गुड़गांव में 400 से अधिक आईटी-आईटीईएस कंपनियां हैं।
-गुड़गांव में देश का सबसे खास इंटरटेनमेंट हब किंगडम ऑफ ड्रीम्स है।
देश का सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल हब
देश की 80 फीसदी मोबाइल क्रेन, 48 फीसदी पैसेंजर कार, 39 फीसदी दोपहिया वाहन और 11 फीसदी ट्रैक्टर यहीं बनते हैं। वहीं गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, कोकाकोला, हुवेई, नेस्ले, सेपिएंट, आईबीएम, कन्वर्जेज, मित्सुबिसी, व्हर्लपूल, पैनासोनिक, सुजूकी, इंटेल, नोकिया, एरिक्शन, डेल, सैमसंग और कैनन जैसी नामी कंपनियां हैं।