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अगर भाजपा ने न की होती ये गलतियां तो आम आदमी पार्टी को नहीं मिलती इतनी बड़ी जीत

Tue, 29 Aug 2017 12:30 PM IST
विजय सिंघल/अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

आप ने नाकारात्मक राजनीति कम की तो भाजपा-कांग्रेस ने अपनाई 
बवाना उपचुनाव-
आप को मिली आक्सीजन, कई हार के मंथन से मिली जीत 
आप ने नाकारात्मक राजनीति कम की तो भाजपा-कांग्रेस ने अपनाई 
जनता के बीच संवाद शुरु करना भी आप की जीत में बना सहायक 

नई दिल्ली, 28 अगस्त  
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- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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दिल्ली व कई अन्य राज्यों में लगातार हार के कारण कांग्रेस व भाजपा के निशाने पर रही आम आदमी पार्टी को बवाना उपचुनाव की जीत से नई ऊर्जा मिली है। वहीं दूसरी तरफ आप पार्टी के विधायकों व नेताओं को तोड़ कर चुनाव मैदान में उतरी भाजपा को गहरा झटका लगा है और उसका दावं उल्टा पड़ गया।
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इतना ही नहीं वह अपने पहले मिले वोट को भी नहीं बचा पाई। उधर कांग्रेस को भले ही हार का सामना करना पड़ा लेकिन उसके लिए यह राहत की बात रही कि पिछले चुनावों के मुकाबले उसका जनाधार बढ़ा है। आप की राजनीति ने चुनाव को एक पक्षीय बनाकर रख दिया।

बवाना चुनाव आप, कांग्रेस व भाजपा के लिए करो-मरो का चुनाव बन गया था। यही कारण है कि तीनों दलों ने जीत के लिए उपचुनाव में अपने राष्ट्रीय स्तर के नेताओं को मैदान में उतार दिया था।
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मंथन करने की रणनीति काम आई

- फोटो : अमर उजाला
आपकी जीत से उसे लगातार हार से आक्सीजन मिली है। आप की जीत के पीछे एक प्रमुख कारण यह भी रहा कि उसने अपनी नाकारात्मक राजनीति को बदला है। पहले हार बात पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास करने वाली आप ने पंजाब, गोवा, एमसीडी व राजौरी गार्डन चुनावों के बाद अपनी रणनीति में बदलाव किया।

मंथन करने की रणनीति काम आई। आप के विधायक जो पहले लोगों से कट गए थे उनका लोगों से पुन: संवाद शुरु करने से भी मतदाताओं का विश्वास पुन: आप की ओर गया। 
पार्टी ने नकारात्मक राजनीति को छोड़ चुपचाप काम पर ध्यान देना शुरु कर दिया।

आरोप-प्रत्यारोप से किनारा कर काम पर ध्यान दिया जाना शुरु किया। यही कारण है सोशल मीडिया पर यह चलने लगा कि क्या केजरीवाल ने मुंह पर फेवीकोल लगा लिया। उसी फेवीकोल का नतीजा है बवाना चुनाव में भारी जीत। आप वर्ष 2015 में मिले जनाधार तक तो नहीं पहुंच पाई लेकिन चुनाव को एक पक्षीय जरूर बना दिया।

भाजपा ने की नाकारात्मक राजनीति

- फोटो : अमर उजाला
वहीं दूसरी तरफ सकारात्मक राजनीति करने वाली भाजपा ने नाकारात्मक राजनीति शुरु कर दी। यही हालत कांग्रेस की रही। हर मुद्दे पर दोनों ही पार्टियों ने आप पर निशाना साधा। राजधानी में डेंगू, चिकनगुणियां जैसी बीमारियां हो या फिर विकास व कोई अन्य समस्या हर मुददे की समस्या का हल ढूंढने की बजाय आप पर आरोप लगाने के अलावा कुछ नहीं किया।

एमसीडी में भाजपा की भारी जीत हुई बावजूद इसके आम लोगों के काम करवाने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। भाजपा ने एमसीडी चुनावों में आप के एक विधायकों व कई नेताओं को तोड़ कर पार्टी में शामिल किया। बवाना से भी आप के टिकट पर जीते वेद प्रकाश को मैदान में उतार दिया।

वेद प्रकाश आप की प्रचंड हवा में जीत जरूर गए लेकिन मतदाताओं के दिलों में जगह नहीं बना पाए। वेद प्रकाश को टिकट देने से भाजपा अपने कटटर समर्थकों को नाराज कर बैठी और उसका पांच प्रतिशत वोट बैंक खिसक गया। यानि आप नेताओं को तोड़ कर आप को झटका देने की रणनीति उल्टी पड़ गई और भाजपा खुद ही झटका खा गई। 
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पिछले चार चुनावों में वोट प्रतिशत

- फोटो : अमर उजाला
वर्ष 2013 के विधानसभा के चुनावों में भाजपा को 41.10 प्रतिशत, वर्ष 2015 में 31.16 व एमसीडी चुनावों में उसे 32.47 प्रतिशत वोट मिले थे, मगर बवाना उप चुनावों में उसका वोट प्रतिशत 27.16 तक सिमट कर रह गया।

वहीं आप ने वर्ष 2013 के विधानसभा के चुनावों में 25.69 प्रतिशत, वर्ष 2015 में 58.14 व एमसीडी चुनावों में उसे 22.25 प्रतिशत वोट मिले थे, मगर बवाना उप चुनावों में उसका वोट प्रतिशत बढ़ कर पुन: 45.39 तक पहुंच गया।

कांग्रेस ने वर्ष 2013 के विधानसभा के चुनावों में 25.26 प्रतिशत, वर्ष 2015 में 7.87 व एमसीडी चुनावों में उसे 15.41 प्रतिशत वोट मिले थे, मगर बवाना उप चुनावों में उसका वोट प्रतिशत 24.14 तक पहुंच गया।
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