सच का शायद एक ही चेहरा होता है लेकिन झूठ के कई। बिसाहड़ा मामले में ऐसा ही हो रहा है। कुछ न्यूज पोर्टल और सोशल नेटवर्क़िंग साइट्स ने जिस तरह माहौल बिगाड़ने का प्रयास किया वह बेहद चिंतनीय है।
साथ ही पुलिस और प्रशासन के लिए बड़ी सिरदर्दी है कि सोशल मीडिया के विस्तार को देखते हुए किस तरह ऐसी घटनाओं पर रोक लगाए।
कुछ उदादहरण देखिये। हाल में एक न्यूज पोर्टल ने लिखा कि केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता मेनका गांधी से संबंधित संगठन पीपुल फार एनिमल (पीएफए) के दो स्वयंसेवी बिसाहड़ा कांड से जुड़े हैं। मेनका ने इसे गलत बताया और प्रशासन ने पोर्टल पर कार्रवाई की।
मनमाने ढंग से खबरों पेश किया जाना घटना के तत्काल बाद से ही शुरू हो गया था। एक अंग्रेजी अखबार ने प्रमुखता से खबर लगाई कि आरोपी होमगार्ड है, जिसे गिरफ्तार कर पुलिस पूछताछ कर रही है।
बाद में यह बात एकदम निराधार निकली। इसी अखबार ने एक दिन लिखा कि इकलाख ने अंतिम काल अपने एक हिंदू दोस्त को कोल की थी। बाद में इसी अखबार ने खंडन करते हुए लिखा कि जिस दोस्त का जिक्र है उस नाम का कोई आदमी गांव में नहीं रहता।