यादवेंद्र सिंह का कहना है कि भगत सिंह सैनिकों जैसी शहादत चाहते थे। वह फांसी की बजाय सीने पर गोली खाकर वीरगति को प्राप्त होना चाहते थे। यह बात उनके लिखे एक पत्र में थी।
उन्होंने 20 मार्च 1931 को तत्कालीन पंजाब के गवर्नर से मांग की थी कि उन्हें युद्धबंदी माना जाए और फांसी पर लटकाने की बजाय गोली से उड़ा दिया जाए। ब्रिटिश सरकार ने उनकी यह मांग नहीं मानी।
सारे नियम-कानून का उल्लंघन कर निर्धारित तिथि से एक दिन पहले 23 मार्च 1931 को ही भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी। यही नहीं, डरी हुई गोरों की सरकार ने सुबह की बजाय शाम को फांसी दी, जो कानून का घोर उल्लंघन था।