कभी हिदायतपुर छावनी के नाम से मशहूर गुड़गांव आज साइबर सिटी बन चुका है। यह शहर आधुनिकता और विकास की नई-नई परिभाषाएं गढ़ रहा है, पर कुछ चीजें विकास की आंधी में पीछे छूटती जा रही हैं।
इन्हीं में से एक है ‘बेरी वाला बाग’। यह शब्द सुनते ही लोगों की बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं। पर, अफसोस है कि कभी तकरीबन छह एकड़ क्षेत्र में फैले इसी ‘बेरी वाला बाग’ का अस्तित्व अब खतरे में है।
राष्ट्रीय राजमार्ग-8 स्थित शांति नगर में यह बेरी का बाग है। आज से डेढ़ दशक पहले इस क्षेत्र में बेर के हजारों पेड़ हुआ करते थे। ताजा हालात यह हैं कि अब यहां सौ या सवा सौ पेड़ की ही मौजूदगी है। आज भले ही बाग कुछ पेड़ों में सिमट गया हो पर स्थान की पहचान इसी नाम से है।
यहां की बेर गुड़गांव ही नहीं देशभर में ख्यातिप्राप्त थी। दिल्ली की मंडियों और घरों में बेरी वाला बाग की बेर कह कर बेचा जाता था। पूर्व रणजी प्लेयर न्यू कॉलोनी निवासी विनय वर्मा का कहना है कि वह अपने साथियों के साथ यहां रोजाना बेर तोड़ने आता था।
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रखवाले से सावधान होकर कुछ बेर तोड़ता और भाग जाता। चार/आठ मरला निवासी डॉ. दुर्गेश चुघ का कहना है कि बेरी वाला बाग का नाम सुनते ही बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं। वह बताते हैं कि बचपन की कई यादें इससे जुड़ी हुई हैं।
उम्र के 62 बसंत देख चुके राजवीर सिंह को छुटपन में बेर चुका कर खाना आज भी याद है। उनका कहना है कि पहले बाग था आज कुछ पेड़ ही दिखते हैं। इसकी हालत देख तकलीफ होती है।
नहीं भूलता स्वाद
बेरी वाला बाग की बेरों का स्वाद बड़ा निराला था। बुजुर्ग चरणजीत का कहना है कि दशहरा आते ही बेरी का बाग बच्चों का अड्डा बन जाता था। दिसंबर, जनवरी और फरवरी में तो बागों से बेर चुराने वाले बच्चों और रखवालों दोनों की मुसीबत बढ़ जाती थी। बड़ा मजा आता था। रोजाना यहां से कई क्विंटल बेर निकलती थी। आज यह आंकड़ा रोजाना 25 किलोग्राम का है। लोगों का कहना है कि पहले गुड़गांव में सिर्फ बेरी वाले बाग की बेर बिकती थी। आज यहां अलीगढ़, खुर्जा और अतरौली की बेर बिकने लगी है। गुड़गांव में बादशाहपुर, सोहना और काकरौला में भी बेर की बागवानी है।
क्यों खत्म हो रहा है अस्तित्व
इस समय बेरी वाले बाग की रखवाली कर रहे शीबू बताते हैं कि लोग लकड़ी काट कर उठा ले जाते हैं। आसपास भवनों का निर्माण तेजी से हो रहा है। स्थायी रूप से कोई बाग की देखभाल करने वाला नहीं है। ठेका खत्म होने के बाद शीबू चला जाता है। बाग को सबसे अधिक नुकसान लकड़ियां काटने वालों ने किया है। उसका कहना है कि यहां कोई प्रोजेक्ट आने वाला है। इसके बाद तो बेरी वाला बाग कहानी बन जाएगा। बाग के बीच से सड़कें बना दी गई हैं। बाग के बीच से लोगों के आना-जाना शुरू हो गया है। बाग का दायरा रोजाना कुछ न कुछ घटता जा रहा है।