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अटाली में अब अखरने लगा सन्नाटा, खाने के पड़े हैं लाले

Sun, 07 Jun 2015 08:59 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, फरीदाबाद
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बस्ती में है वो सन्नाटा जंगल मात लगे... शाम ढले जो घर लौटूं तो आधी रात लगे... किसी शायर की यह लाइनें हिंसा का शिकार हुए अटाली गांव के हालात बयान करती प्रतीत होती हैं।
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बिजली कटौती अभी हिंसा प्रभावित क्षेत्र में बहाल नहीं हो पाई है। यहां दिन सन्नाटे में तो रातें अंधेरे में गुजर रही हैं। अघोषित कर्फ्यू जैसे माहौल में रोजगार ठप होने की वजह से अधिकतर लोगों को परिवार चलाने की चिंता सताने लगी है।

25 मई को सांप्रदायिक हिंसा का शिकार हुए अटाली गांव के हर कोने, गली में सिर्फ पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) के जवान ही दिखाई दे रहे हैं। हिंसा के दौरान ठप हुई बिजली आपूर्ति अभी तक सुधारी नहीं जा सकी है।
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खौफ और आशंका के साये में गांव

बिजली न होने की वजह से प्रभावित क्षेत्र में पेयजल की दिक्कत भी शुरू हो गई है। गांव के गयादीन (अनुरोध पर नाम परिवर्तित) का कहना है कि पूरा गांव खौफ और आशंका के साये में जी रहा है।

पहले जिन गलियों में बेहिचक चले जाते थे, अब उधर से गुजरने की हिम्मत नहीं होती। उन्होंने कहा कि यही हाल उन लोगों का है पहले वो मस्जिद के लिए हमारे घर के सामने से होकर जाते थे, लेकिन अब मुख्य सड़क से होकर गुजरने वाले रास्ते से जाते हैं।

रईस खां कहते हैं कि शाम होते ही प्रभावित क्षेत्र अंधेरे और सन्नाटे में डूब जाता है। हिंसा के बाद घरों में दरवाजे खिड़कियां बची नहीं है रात को जानवर भी आता है तो लगता है कि कहीं हमला तो नहीं हुआ।
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अब तो खाने के भी लाले पड़ रहे हैं

दिन तो किसी तरह कट जाता है, रात मुश्किल से गुजरती है। बिजली न होने की वजह से काफी दिक्कतें आ रही हैं। गांव के बाहर किराना की दुकान चलाने वाले धर्मदास (अनुरोध पर नाम परिवर्तित) कहते हैं कि पंद्रह दिन से दुकान बंद है, रोजगार ठप हो चुका है।

घर में रखा अनाज भी खत्म होने को है अगर जल्द दुकान नहीं खोली तो परिवार के सामने मुश्किल खड़ी हो जाएगी। हन्नी दैनिक मजदूर हैं। उन्होंने बताया कि गांव में कम से कम पचास लोग दिहाड़ी पर कमाने खाने वाले हैं।

गांव से बाहर परिवार को रख नहीं सकते और रोजगार के लिए उन्हें छोड़कर जा भी नहीं सकते। गांव में जो काम कर कमाते थे, पुलिस और प्रशासन ने उस सब पर रोक लगा रखी है। अब तो खाने के भी लाले पड़ रहे हैं।
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