औद्योगिक नगरी की आबोहवा दीपावली के बाद काफी खराब हो गई है। सांस के रोगों का मुख्य कारक पर्टिकुलेट मैटर 2.5 आतिशबाजी के बाद में वातावरण में सुरक्षित मात्रा से कहीं ज्यादा घुल गया है जबकि नाइट्रोजन, सल्फर के ऑक्साइड की मात्रा ढाई से तीन गुना ज्यादा बढ़ी है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने औद्योगिक नगरी की आबोहवा को बहुत खराब श्रेणी में डाला है। इस श्रेणी का अर्थ है कि यदि ज्यादा देर तक ऐसी ही आबोहवा रही तो लोग सांस के गंभीर रोगों से ग्रस्त हो जाएंगे।
हालांकि दिल्ली एनसीआर में बिक्री प्रतिबंधित होने से पटाखे खुलेआम नहीं बिक सके। यही वजह है कि पिछले वर्ष की अपेक्षा इस दिवाली आतिशबाजी कम हुई। दूषित पर्यावरण से जूझ रहे औद्योगिक नगरी में हुई कम आतिशबाजी ने भी आबोहवा बिगाड़ दी।
वायुमंडल में घुले पर्टिकुलेट मैटर 2.5 यानि 2.5 माईक्रोग्राम से छोटे कणों की सुरक्षित मात्रा 60 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर है। दिवाली से पहले इसकी मात्रा 130 माइक्रोग्राम/घनमीटर थी जो बढ़ कर 309.61 माइक्रोग्राम/घनमीटर के खतरनाक स्तर पर पहुंच गई।
सांस-फेफड़ों की गंभीर समस्या
चिकित्सकों के मुताबिक वातावरण में पीएम 2.5 की मात्रा पांच गुना बढने से सांस की नली में सूजन, खांसी के अलावा फेफड़ों की गंभीर समस्या पैदा हो सकती है। पीएम 2.5 के अलावा पीएम 10 की मात्रा का आकलन नहीं किया गया है पर्यावरण मामलों के जानकार डॉ. सागर रत्रा के मुताबिक आतिशबाजी को रंगीन बनाने के लिए उसमें प्रयोग किए जाने वाली धातुएं जैसे तांबा, एल्युमिनियम, लोहा आदि के ऑक्साइड पीएम 10 प्रदूषण के कारक हैं जबकि धुआं और आदि पीएम 2.5 के। उनके मुताबिक हालांकि पीएम दस की मात्रा अधिकतर निर्माण स्थलों के पास अधिक होता है लेकिन आतिशबाजी के बाद इसकी मात्रा ढाई से तीन गुना ज्यादा हो जाती है। पीएम 2.5 के कारण की प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने औद्योगिक नगरी की आबोहवा को बहुत खराब की श्रेणी में रखा है।
संभलने में लगेंगे डेढ़ से दो सप्ताह
प्रदूषण के मुख्य कारक के अलावा आतिशबाजी के बाद से सल्फर डाईऑक्साइड की मात्रा वातावरण में 26.50 से बढ़ कर 35.25 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर हो गई जबकि नाईट्रिक ऑक्साइड 4.47 से 26.01 माइक्रोग्राम के स्तर पर पहुंच गया। नाइट्रोजन के ऑक्साइड्स की मात्रा भी 32.04 से बढ़कर 51.44 पीपीबी (पार्ट पर बिलियन) पहुंच गई। बेंजीन की मात्रा दिवाली के बाद 1.19 से बढ़कर 2.67 माइक्रोग्राम और टॉल्यूईन 5.51 से बढ़कर 7.12 माइक्रोग्राम हो गई है। यह दोनों ही रसायन त्वचा और सांस के लिएहानिकारक हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों की मानें तो वातावरण शुद्ध होने में डेढ़ से दो सप्ताह लग सकते हैं।