जब वह पत्रकारिता करते थे तो उनकी छवि एक जुझारू और संवेदनशील पत्रकार की थी। वह नौजवान पत्रकारों के आदर्श भी रहे हैं। उन पर पत्रकारिता का ऐसा जुनून था कि वह बसपा संस्थापक कांशीराम से थप्पड़ तक खा चुके हैं। उनकी गंभीरता ही उनके आम आदमी पार्टी में जाने की वजह बनी तो वही उनके निकलने की भी।
पूर्व पत्रकार आशुतोष ने साल 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप को मिली कामयाबी के फलस्वरूप केजरीवाल के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद साल 2014 में पार्टी की सदस्यता ग्रहण की थी।
इसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में वह आप के टिकट पर दिल्ली की चांदनी चौक सीट से चुनाव लड़े थे। हालांकि इसमें उन्हें भाजपा के डा. हर्षवर्धन के सामने हार का सामना करना पड़ा था।
वह इस साल जनवरी में दिल्ली की राज्यसभा की तीन सीटों के लिये तय किये गये उम्मीदवारों की सूची में शामिल नहीं किये जाने के बाद से असंतुष्ट चल रहे थे। उन्होंने उम्मीदवारों के रूप में दो कारोबारियों को चुने जाने पर पीएसी की बैठक में भी असहमति व्यक्त की थी।
आम आदमी पार्टी का छोटा सा इतिहास खंगाले तो पाएंगे कि इस पार्टी वो हर आदमी निकाल दिया गया या खुद बाहर हो गया जो अपना विचार रखता था, अपनी बुद्धिमत्ता के लिए जाना जाता था।
किरण बेदी, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, मयंक गांधी, शाजिया इल्मी और कुमार विश्वास के साथ आशुतोष भी आप के संस्थापक सदस्यों में से थे। ये सभी एक-एक कर पार्टी से अलग हो गए। यहां तक कि केजरीवाल को जिस अन्ना हजारे की वजह से पहचान मिली वह भी केजरीवाल से दूर हो गए।
इन सब में जो एक बात समान थी वो ये कि ये सब मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि के थे। यह आंदोलन की शुरुआत से आप में थे और नीति निर्धारण में अपनी बराबरी की भूमिका समझते थे। ये उन विचारों से जुड़े हुए थे जो ये सोचते थे कि पार्टी में लोकतंत्र होगा और कोई आला कमान नहीं होगा। आखिर यही सब भाषण देकर तो अरविंद केजरीवाल दो बार दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे।
लेकिन कुर्सी पर पहुंचने के बाद उन्होंने वे सारी चीजें शुरू कीं, जिनका वे आंदोलनकारी के रूप में विरोध करते थे। ऐसे में ये सोचने समझने वाले चेहरे उनके उनके साथ ज्यादा समय तक नहीं रह पाए।
आम आदमी पार्टी से आशुतोष का जाना पार्टी की बौद्धिक सफाई के अभियान को लगभग पूरा करती दिखती है। आशुतोष के जाने के बाद जो आम आदमी पार्टी बची है वो विशुद्ध रूप से अन्य राजनीतिक पार्टियों की तरह ही है। अब ये पार्टी वो पार्टी नहीं रही जो अलग राजनीति करने आई थी, ऐसा जानकार मानते हैं।