दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग ने हाल ही में घोषणा की है कि भारतीय इतिहास का नए सिरे से अध्ययन कर विस्तृत रिपोर्ट सरकार को देगी।
विभाग का मानना है कि अब तक भारतीय इतिहास को केवल मार्क्सवादी और पश्चिमी जगत की निगाह से ही देखा और समझा गया है। इस अध्ययन में आर्यों को विदेशी बताया गया है। जबकि सच्चाई है कि आर्य यहां के मूलनिवासी थे।
विभाग का मानना है कि फिलहाल देश के सभी राज्यों के स्कूल बोर्ड और सीबीएसई की किताबों में भी इतिहास की व्याख्या पश्चिमी नजरिए से ही की गई है। हालांकि इतिहास का दूसरा पहलू भी जो इसकी मार्क्सवादी व्याख्या करता है।
इस व्याख्या का सबसे बड़ा दोष है कि इसमें आर्य संस्कृति और वैदिक युग के बारे में निष्पक्ष तस्वीर पेश नहीं हो पाती। इस दोष को दूर करने का जिम्मा डीयू के संस्कृत विभाग ने उठाया है जिसमें वह इतिहास की व्याख्या भारतीय नजरिए से करने की कोशिश करेंगे।
इनका मत है कि इतिहास के बारे में केवल मार्क्सवादी और पश्चिमी व्याख्या को ही महत्व क्यों दिया जाए। संस्कृत विभाग के अध्यक्ष रमेश भारद्वाज का कहना है कि इतिहास का यह अध्ययन पूरी तरह से तथ्यों और पिछले 100 वर्ष की जानकारियों पर आधारित होगा।