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राजनीति के पुराने मकड़जाल का नया शिकार बन चुके हैं केजरीवाल!

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Political revolution in India has begun. Bharat jaldi badlega. Arvind Kejriwal. अंग्रेजी में लिखी ये लाइन असल में केजरीवाल के ट्विटर अकाउंट में उनकी प्रोफाइल फोटो के ठीक नीचे लिखी हुई है।
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भारत बदले न बदले केजरीवाल में बदलाव जल्दी ही दिखने लगा है। अन्ना हजारे के जनलोकपाल आंदोलन से भारतीय राजनीति में पदार्पण करने वाले अरविंद केजरीवाल परंपरागत राजनीति की बुराइयों को खत्म करने का नारा लेकर आए थे।

शुक्रवार को बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में अपने मंत्रियों के साथ पद और गोपनीयता की शपथ ले रहे थे जबकि, उसी वक्त दिल्ली के रामलीला मैदान से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करने वाले केजरीवाल की एक तस्वीर, राजनीति में एक नए बदलाव का संकेत दे रही थी।
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3 अक्टूबर 2013 को जब राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में सजा सुनाई गई थी तो केजरीवाल ने ट्वीट कर लिखा, 'करोड़ों का चारा घोटाला करने वाले लालू से उस संपत्ति को वापस लेने का कोई आदेश नहीं दिया गया। केवल 25 लाख का जुर्माना और कुछ सालों की जेल, स्वीट डील!'

इसके कुछ देर बाद उन्होंने दूसरा ट्वीट कर लिखा, 'यही कारण है कि लालू ने अन्ना के जनलोकपाल का विरोध किया।' असल में केजरीवाल के ये ट्वीट शुक्रवार (नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण समारोह) से एक बार फिर से सोशल मीडिया (#KejriwalHugsCorruption)पर छाए हुए हैं क्योंकि इसी समारोह में केजरीवाल ने लालू यादव को न सिर्फ गले लगाया बल्कि, हाथ ऊपर उठा कर गांधी मैदान में बैठी जनता को भी लालू संग अपनी एकता की झलक दिखाई।
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क्या केजरीवाल परिवारवाद का समर्थन कर रहे?

केजरीवाल ने जब राजनीति में कदम रखा तो साफ किया था कि वह इसे परंपरागत राजनीति को बदल कर एक नए ढंग की राजनीति शुरु करेंगे। इसमें सबसे बड़ा मुद्दा था राजनीति से परिवारवाद और भाई-भतीजावाद का खात्मा।

शुक्रवार को जब केजरीवाल लालू यादव के गले लगा रहे थे तो भ्रष्टाचार के आरोप में सजा पा चुके लालू यादव राजनीति में परिवारवाद की नई परंपरा को आगे बढ़ा रहे थे। पहली बार विधायक बने लालू के दोनों बेटे नीतीश के मंत्री के तौर पर शपथ ले रहे थे।

हालांकि, इससे पहले जब केजरीवाल ने दिल्ली महिला आयोग अध्यक्ष के तौर पर स्वाति मालिवाल को नियुक्त किया था तब भी उन पर परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगा था।
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दिल्ली के बाहर नहीं जाएंगे!

केजरीवाल ने इसी साल 14 फरवरी को दिल्ली के रामलीला मैदान में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी और इसके ठीक बाद जो भाषण दिया उसमें उन्होंने दिल्ली के लोगों को साफ-साफ कहा कि अगले पांच साल तक वह केवल दिल्ली के लोगों की सेवा करेंगे।

दिल्ली में मिली ऐतिहासिक जीत के बाद केजरीवाल की इस साफगोई ने कई राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया था। क्योंकि वो साफ कर चुके थे कि दिल्ली से बाहर जाने का उनका कोई इरादा नहीं है।

हालांकि मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही महीनों बाद उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, अखिलेश यादव सहित पूर्वोत्तर के कुछ मुख्यमंत्रियों को दिल्ली आमंत्रित किया और उनके साथ संघीय ढांचे पर चर्चा की। इस बैठक में भी अखिलेश यादव नहीं आए थे।

नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण समारोह में भी ये सारे मुख्यमंत्री (अखिलेश यादव को छोड़कर) एक बार फिर से एक साथ दिखे। क्या केजरीवाल दिल्ली से बाहर जाने की नहीं सोच रहे?
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