सही समय पर केवल 10 प्रतिशत में ही हो पाती है पहचान
अल्जाइमर दिवस के अवसर पर एम्स और एआरडीएसआई की ओर से हुआ चर्चा का आयोजन
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। देश में मौजूदा समय में लगभग 88 लाख बुजुर्ग डिमेंशिया से ग्रस्त हैं लेकिन केवल 10 प्रतिशत का ही सही निदान हो पाता है। देरी से या गलत निदान के कारण रोगी और उनके परिवार समय पर देखभाल और हस्तक्षेप से वंचित रह जाते हैं। अगर सही समय पर इसकी पहचान हो जाए तो जीवनशैली में सुधार जैसे धूम्रपान व अत्यधिक शराब से परहेज, नियमित शारीरिक गतिविधि और मधुमेह-उच्च रक्तचाप जैसी स्थितियों का प्रबंधन, डिमेंशिया के जोखिम को 40 प्रतिशत तक किया जा सकता है।
यह जन जागरूकता और सुलभ निदान सेवाओं की तत्काल जरूरत को उजागर करता है। यह जानकारी एआरडीएसआई दिल्ली चैप्टर की अध्यक्ष डॉ. मंजरी त्रिपाठी ने दी। वह अल्जाइमर दिवस के अवसर पर एम्स न्यूरोलॉजी एवं एनाटॉमी विभाग और एआरडीएसआई दिल्ली चैप्टर की ओर से आयोजित कार्यक्रम में चर्चा कर रही थी। चर्चा की थीम डिमेंशिया के बारे में पूछें, अल्जाइमर के बारे में पूछें रही। इसका उद्देश्य लोगों को डिमेंशिया बीमारी के बारे में जागरूक करना था।
इस दौरान त्रिपाठी ने कहा कि डिमेंशिया के बारे में पूछना ही समझने की दिशा में पहला कदम है। ऐसे में लोगों को इस बार में खुलकर बात करने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि रोग की पहचान न केवल उसके फैलने की प्रगति को धीमा करती है, बल्कि प्रभावित मरीजों के लिए सम्मान और जीवन को अच्छा रखने में अहम भूमिका अदा करती है। इस अवसर पर प्रोफेसर रीमा दादा ने बताया कि पंचवटी, तुगलकाबाद एक्सटेंशन स्थित डेकेयर सुविधा शहर के चुनिंदा केंद्रों में से एक है, जो मौजूदा समय में 11 डिमेंशिया रोगियों को सहायता प्रदान कर रहा है। यहां रोगियों को घर से सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था उपलब्ध है। उन्होंने बताया कि यहां फिजियोथेरेपी और रचनात्मक कार्य के चलते परिवारों के लिए जीवन रेखा साबित हो रहा है व बुजुर्गों की जीवन गुणवत्ता में सुधार ला रहा है।