मानसून की बेरुखी के साथ ही अफसरों की मनमानी अब किसानों पर भारी पड़ रही है। बारिश न होने से एक ओर जहां फसलें सूख रही हैं, वहीं कृषि क्षेत्र की बिजली सप्लाई में कटौती कर दी गई है।
सूखे की सबसे ज्यादा मार फसलों पर पड़ती है। वेस्ट यूपी में फसलों की सिंचाई का मुख्य माध्यम बिजली है। बारिश कम होने या सूखा पड़ने की स्थिति में नलकूपों के सहारे किसान फसलों को जिंदा रख पाते हैं।
मानसून आने में देरी होने से वेस्ट यूपी में फसलें सूखनी शुरू हो गई हैं। कई फसलों की बुवाई ही नहीं हो पाई है। ऐसे में खड़ी फसलों को बचाने के लिए किसानों को ज्यादा बिजली सप्लाई की जरूरत है।
ऐसे में सप्लाई बढ़ाने की बजाय कारपोरेशन ने और कम कर दी है। अब किसानों-ग्रामीणों को 16 घंटे के स्थान पर 10 घंटे बिजली देने के आदेश कर दिए हैं।
लचर सिस्टम से भी परेशानी होती है, ऐसे में किसानों को 6-7 घंटे की सप्लाई ही मिल पा रही है। बिजली ने सूखे में और परेशानी खड़ी कर दी है।
अंग्रेजों के जमाने के नियमों से होता है फसलों के नुकसान का आकलन
शासन के सूखाग्रस्त घोषित करने के बाद बिजली सप्लाई और नहरों में जलापूर्ति बढ़ा दी जाएगी। लेकिन सूखाग्रस्त घोषित करने के मानक भी सौ साल पुराने हैं। इनके तहत अगस्त तक बारिश न होने और एक तिहाई फसल नष्ट हो जाने पर सर्वे के आदेश दिए जाएंगे।
सर्वे रिपोर्ट आने के बाद डीएम-कमिश्नर की ओर से शासन को रिपोर्ट जाएगी। इसके बाद मंत्रिमंडल सूखाग्रस्त होने की घोषणा करेगा। इसका प्रस्ताव केंद्र सरकार को भजा जाएगा। वहां से पैकेज की घोषणा की जाएगी।
प्राप्त पैकेज के बाद फिर सर्वे किया जाएगा। इसमें फसलों में हुए नुकसान की स्थिति प्रत्येक किसान की अलग-अलग निकाली जाएगी। इसके आधार पर उनके मुआवजे का निर्धारण किया जाएगा।
मुआवजे का निर्धारण भी मनमाने तरीके से किया जाता है। ऐसे में किसानों को 50-100 रुपये प्रति बीघे का मुआवजा मिलता है।
जबकि नुकसान हजारों का होता है। किसानों को मिलने वाला मुआवजा भी कई महीने बाद दिया जाता है। ऐसे में सूखे का आंकलन और मुआवजा किसानों को कोई फायदा नहीं पहुंचाता है। ऐसे में यदि किसानों को पर्याप्त बिजली दी जाए तो नुकसान को कम किया जा सकता है।