देश की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखला अरावली भूजल संरक्षण के साथ ही जैव विविधता को भी सहारा देती है। इसकी चट्टानों में मौजूद प्राकृतिक दरारें बारिश के पानी को जमीन के भीतर संग्रहीत करने में मदद करती हैं, जिससे प्रति हेक्टेयर करीब 20 लाख लीटर पानी सुरक्षित हो सकता है। यही वजह है कि पानी की कमी से जूझ रहे दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और राजस्थान के लिए अरावली बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और राजस्थान के लिए अरावली पर्वत श्रृंखला केवल प्राकृतिक सुंदरता ही नहीं, बल्कि जीवनरक्षक संसाधनों का भी खजाना है।
केंद्रीय अरावली में 31 प्रकार के बड़े-छोटे स्तनधारी जानवर पाए जाते हैं। इसमें तेंदुआ, स्लॉथ बियर, नीलबाई, जैकल और मोंगूस शामिल है। दिल्ली और हरियाणा के अरावली में 15 प्रकार के स्तनधारी हैं। 300 से ज्यादा पक्षी प्रजातियां और कई सरीसृप हैं। कोलियोप्टेरा (बीटल) की 47 प्रजातियां भी यहां मौजूद हैं। पहाड़ियां कटती रहीं तो ये, जानवर विलुप्त हो सकते हैं या शहरों-गांवों की तरफ आएंगे। अरावली के जंगलों में सूखे पर्णपाती वन हैं यानी पतझड़ी जंगल हैं। जैसे-धोक, बबूल, नीम। यहां 200 से ज्यादा प्रजातियां हैं, जिनमें पोएसी (34 प्रजातियां), फैबेसी (28) और एस्टरासी (23) प्रमुख हैं। अरावली बायो-डायवर्सिटी पार्क में 240 से ज्यादा औषधीय पौधे हैं, जैसे ब्राह्मी, गुग्गुल और हडजोड़। ये पौधे मिट्टी को बांधते हैं।
अरावली ढाल बनकर खड़ी है तभी तो राजस्थान के रेगिस्तान से अच्छी वर्षा अरावली क्षेत्र में होती है। इस पर्वतमाला में सीधी दरार हैं, जिनसे वर्षा जल भूजल भंडारों में जमा होता रहता है। इसी से चारों राज्यों में जहां अरावली पर्वतमाला है, वहां मीठा जल, सुरक्षित पेयजल आज भी उपलब्ध होता रहता है।