कोरोना संक्रमण के दौर में लोगों का घरों से ज्यादा बाहर निकलना बंद हुआ है तो लावारिस जानवरों के काटने के मामले भी कम हुए हैं। इसके बावजूद राज्य कर्मचारी बीमा निगम (ईएसआईसी) के सदस्यों को एंटी रेबीज वैक्सीन उपलब्ध नहीं है।
कारण कि बीमित लोगों के लिए ईएसआईसी अस्पताल में दो साल से वैक्सीन है ही नहीं। ऐसे में उन्हें निजी खर्च पर वैक्सीनेशन कराना पड़ रहा है। बाद में इसका पैसा निगम उनके खाते में भेज देता है। हालांकि बीके सिविल अस्पताल में फिलहाल एंटी रेबीज वैक्सीन की कोई कमी नहीं है।
जिले में रोज औसतन 100 लोगों को लावारिस पशु काटते थे। यह इन दिनों घटकर 50 फीसदी से भी कम हो गया है। इसी कारण बीके सिविल अस्पताल में एंटी रेबीज वैक्सीन पर्याप्त है। हालांकि पहले यहां भी मरीजों को वैक्सीन की कमी से जूझना पड़ता था।
अस्पताल की प्रधान चिकित्सा अधिकारी डॉ. सविता यादव का कहना है कि कोराना संक्रमण बढ़ने के कारण ही लोग घर से कम से कम निकल रहे हैं। इसी कारण लावारिस जानवरों के काटने में भी कमी आई है।
रेबीज के मामले में वैक्सीनेशन आपात स्थिति में कराने का प्रावधान नहीं है। अस्पताल के वैक्सीनेशन प्रभारी सुनील ने बताया कि घटना के 24 घंटे के भीतर एंटी रेबीज वैक्सीन दी जानी चाहिए। ऐसे में इमरजेंसी में वैक्सीनेशन का कोई प्रावधान नहीं है। मरीजों को किसी विशेष कारण से ही इमरजेंसी में वैक्सीन दी जाती है।
ईएसआईसी खाते में पहुंचा देता है पैसा
कोरोना के कारण एनआईटी-3 स्थित ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज में ओपीडी सेवाएं इन दिनों पूरी तरह बंद हैं। मरीजों को ईएसआईसी से संबंधित डिस्पेंसरी और सेक्टर-8 स्थित ईएसआईसी अस्पताल में ही सुविधाएं मिल रही हैं।
सेक्टर-8 स्थित ईएसआईसी अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. पुनीत बंसल ने बताया कि दो साल से ईएसआईसी में वैक्सीन का स्टॉक उपलब्ध नहीं कराया गया है। ऐसे में बीमाकृत कर्मचारी और उनके परिजनों को निजी स्तर पर ही वैक्सीन लगवानी होती है। इसका खर्च बाद में बीमाधारक के बैंक खाते में पहुंचा दिया जाता है।
पांच वर्षीय बच्चे को लगे थे 200 टांके
जिले में लावारिस जानवरों का जबरदस्त खौफ है। इसी वर्ष गांव पलवली में घर के बाहर खेल रहे पांच वर्षीय बच्चे पर चार-पांच कुत्तों ने हमला कर दिया था। एक आंख में ज्यादा चोट आने के कारण बच्चे की सर्जरी करनी पड़ी थी। इसमें बच्चे को 200 टांके लगे थे।