एम्स के डॉक्टरों का यहां तक कहना है कि प्रदूषण की वजह से हर माह मरीजों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन पिछले कुछ समय से सीओपीडी के गंभीर रोगी भी एम्स पहुंच रहे हैं। इन मरीजों को तत्काल आईसीयू देने के अलावा डॉक्टरों के पास दूसरा विकल्प नहीं होता। इसके पीछे वजह इलाज में देरी और लापरवाही भी बताई जा रही है। एम्स के वरिष्ठ डॉ. करण मदान का कहना है कि प्रदूषण का स्तर बढ़ने पर श्वास और फेफड़ों के मरीज बढ़ते हैं, लेकिन सीओपीडी और अस्थमा के मरीज हर दिन एम्स में आ रहे हैं।
क्या है सीओपीडी
डॉक्टरों के अनुसार, ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) को हिंदी में काला दमा भी कहते हैं। इसमें फेफड़े में एक काली तार बन जाती है। यह अस्थमा से अलग होता है। इस रोग का सबसे बड़ा कारण धूम्रपान है। गांव में जहां लकड़ी के ईंधन से खाना बनता है उन स्थानों की अधिकतर महिलाएं सीओपीडी की चपेट में रहती हैं। साल 1990 के दौर में सीओपीडी मृत्यु और अपंगता का 13वां कारण था, लेकिन अब ये लंबी उछाल के साथ दूसरे नंबर पर आ गया है।
वे बच्चे जो लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेते हैं। उनके फेफड़े ठीक से विकसित नहीं हो पाते, जिस कारण उन्हें फेफड़ों की परेशानी हो रही है। ओपीडी में आए दिन दिल्ली से ज्यादा आसपास के शहरों से मरीज उपचार के लिए आ रहे हैं।- डॉ. रघुराम मल्लैयाह, फोर्टिस अस्पताल
सीओपीडी मुख्य रूप से फेफड़ों को नष्ट कर देता है। इसकी पहचान हो पाना काफी मुश्किल है। करीब 50 फीसदी मरीजों को विभिन्न जांच के बाद भी इसकी पुष्टि नहीं हो पाती है। ऐसे में जरूरी है कि डॉक्टरों को भी सीओपीडी के बारे में जानकारी रखनी होगी।- डॉ. संदीप नायर, बीएलके अस्पताल