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अमर उजाला खास: हर पल सिकुड़ रहे फेफड़ों को मौत दे रहा काला दमा

Mon, 18 Mar 2019 05:35 PM IST
दुष्यंत शर्मा परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

- दिल के बाद सबसे ज्यादा मौतें सीओपीडी रोगियों की
- दिल्ली और एनसीआर के हजारों लोगों के फेफड़े हैं संक्रमित
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फेफड़े - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सीओपीडी यानि क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज अब लोगों के लिए जानलेवा बन चुकी है। चंद वर्षों के भीतर ही इस बीमारी की वजह से मरने वालों की तादाद लाखों में पहुंच चुकी है। आलम यह है कि प्रदूषण से सिकुड़ रहे फेफड़ों के लिए सीओपीडी जहर बन गया है।

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ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज 2016 के अनुसार, वर्ष 1990 से 2016 के दौरान भारत में सीओपीडी दूसरी सबसे ज्यादा जानलेवा बीमारी के रूप में उभरी है। जिसकी वजह से भारत में लोगों की मौत हो रही है। उनमें हार्ट के बाद सीओपीडी दूसरे नंबर पर है। मौत की इस सूची में अस्थमा 12वें नंबर पर है। इसके अलावा साल 2017 में सीओपीडी की वजह से 9.58 लाख जिंदगियां अपनी सांसें खो चुकी हैं।

एम्स में मरीजों की तादाद भी काफी
देश के सबसे बड़े चिकित्सीय संस्थान एम्स की बात करें तो यहां हर रोज सीओपीडी के मरीज इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। एम्स के ही अनुसार, साल 2014 से 2018 के बीच एम्स में पल्मोनरी मेडिसिन की ओपीडी 10 हजार पार हो चुकी है। डॉक्टरों का कहना है कि हर दिन ओपीडी में 100 से ज्यादा मरीज अस्थमा और सीओपीडी के ही देखने को मिल रहे हैं। इनमें दिल्ली के अलावा गुरुग्राम, नोएडा, गाजियाबाद, पलवल, बहादुरगढ़, फरीदाबाद और मेरठ तक के मरीज शामिल हैं। 

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लापरवाही ज्यादा, आईसीयू की नौबत

एम्स के डॉक्टरों का यहां तक कहना है कि प्रदूषण की वजह से हर माह मरीजों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन पिछले कुछ समय से सीओपीडी के गंभीर रोगी भी एम्स पहुंच रहे हैं। इन मरीजों को तत्काल आईसीयू देने के अलावा डॉक्टरों के पास दूसरा विकल्प नहीं होता। इसके पीछे वजह इलाज में देरी और लापरवाही भी बताई जा रही है। एम्स के वरिष्ठ डॉ. करण मदान का कहना है कि प्रदूषण का स्तर बढ़ने पर श्वास और फेफड़ों के मरीज बढ़ते हैं, लेकिन सीओपीडी और अस्थमा के मरीज हर दिन एम्स में आ रहे हैं।

क्या है सीओपीडी
डॉक्टरों के अनुसार, ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) को हिंदी में काला दमा भी कहते हैं। इसमें फेफड़े में एक काली तार बन जाती है। यह अस्थमा से अलग होता है। इस रोग का सबसे बड़ा कारण धूम्रपान है। गांव में जहां लकड़ी के ईंधन से खाना बनता है उन स्थानों की अधिकतर महिलाएं सीओपीडी की चपेट में रहती हैं। साल 1990 के दौर में सीओपीडी मृत्यु और अपंगता का 13वां कारण था, लेकिन अब ये लंबी उछाल के साथ दूसरे नंबर पर आ गया है।

वे बच्चे जो लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेते हैं। उनके फेफड़े ठीक से विकसित नहीं हो पाते, जिस कारण उन्हें फेफड़ों की परेशानी हो रही है। ओपीडी में आए दिन दिल्ली से ज्यादा आसपास के शहरों से मरीज उपचार के लिए आ रहे हैं।- डॉ. रघुराम मल्लैयाह, फोर्टिस अस्पताल

सीओपीडी मुख्य रूप से फेफड़ों को नष्ट कर देता है। इसकी पहचान हो पाना काफी मुश्किल है। करीब 50 फीसदी मरीजों को विभिन्न जांच के बाद भी इसकी पुष्टि नहीं हो पाती है। ऐसे में जरूरी है कि डॉक्टरों को भी सीओपीडी के बारे में जानकारी रखनी होगी।- डॉ. संदीप नायर, बीएलके अस्पताल


 
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ये हैं जरूरी फैक्टस :

- 1990 में 28 मिलियन लोग थे सीओपीडी के।
- 2016 में 55 मिलियन सीओपीडी के मरीज हुए।
- दुनिया में 32 फीसदी सीओपीडी मरीज सिर्फ भारत में।
- उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली में सर्वाधिक प्रति लाख 2250 से ज्यादा मरीज।
- वायु प्रदूषण, धूम्रपान, घर के अंदर प्रदूषण बीमारी की तीन बड़ी वजह। 
(सभी आंकड़े द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ 2018 के अनुसार)
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