एम्स पल्मोनरी विभाग डॉ. करन मदान ने कहा कि प्रदूषण शरीर के हर अंग को प्रभावित कर रहा है। इसके कारण शोध के दौरान गर्भ में पल रहे बच्चे का वजन कम पाया गया। इसके अलावा ऐसे लोगों में भी सांस समेत दूसरी परेशानियां दिखीं, जो सामान्य थे। उन्होंने कहा कि प्रदूषण के बढ़ते दुष्प्रभाव को देखते हुए मंगलवार को एम्स में वायु प्रदूषण एवं स्वास्थ्य प्रभाव पर चर्चा का आयोजन हुआ। इसमें बताया गया कि प्रदूषण से होने वाले रोगों का इलाज तलाशने से बेहतर जागरूकता बढ़ाकर इस समस्या को कम करना चाहिए। अन्य डॉक्टरों ने कहा कि दिल्ली-एनसीआर में हर साल सर्दियों के दौरान प्रदूषण का स्तर खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है।
बच्चे, बुजुर्ग और रोगी प्रभावित
डॉक्टरों ने कहा कि बढ़ते प्रदूषण स्तर में छोटे बच्चे, बुजुर्ग और रोगी सबसे संवेदनशील होते हैं। इनके फेफड़े प्रदूषक तत्व को झेल नहीं पाते। जिस कारण इनमें समस्या बढ़ जाती है। खासकर दिल और सांस के रोगी की समस्या गंभीर हो जाती है। यदि वह लंबे समय तक प्रदूषित क्षेत्र में रहते हैं तो इनकी मौत तक हो सकती है।
इमरजेंसी में बढ़ जाती है मरीजों की संख्या
आईसीएमआर ने प्रदूषण के दौरान इमरजेंसी में एक शोध किया। इस शोध के दौरान देखने को मिला कि दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का स्तर बढ़ने के बाद इमरजेंसी में अचानक मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ जाती है। इन मरीजों को कई बार आईसीयू तक की जरूरत होती है। डॉक्टरों का कहना है कि प्रदूषण का स्तर कम करके कई समस्याओं को दूर कर सकते हैं। बढ़ता प्रदूषण का स्तर सामान्य लोग को भी सांस, दिल के साथ दूसरे गंभीर रोग का मरीज बना सकता है।
न छोड़ें दवा, रहें प्रदूषण से दूर
डॉक्टरों ने कहा कि जिनकी दवा चल रही है। वह दवा का सेवन बंद न करें। इस दौरान पानी की मात्रा बढ़ा दें। खाने में हल्का खाना लें। प्रदूषण वाली जगह जाने से बचे। ऐसी जगहों पर मास्क भी काम नहीं आता।
यह दिखते हैं लक्षण
- आंखों में जलन
- नाक में जलन
- छींके आना
- सिर में दर्द
- खांसी आना
- सांस लेने में तकलीफ होना
कम वजन के बच्चों में रहता है यह खतरा
- संक्रमण होने का खतरा
- श्वसन समस्याएं
- हाइपोग्लाइसीमिया (कम ब्लड शुगर)
- हाइपोथर्मिया (शरीर का तापमान कम होना)
- खाने में कठिनाई
- विकास और वृद्धि में देरी
- न्यूरोलॉजिकल समस्याएं