मृतक विकास के भाई सुमित वर्मा बताते हैं कि जब विकास की तबियत बिगड़ी थी तो वह तीन अस्पतालों में बिस्तरों के लिए चक्कर लगाते रहे, लेकिन कहीं भी उनके भाई को भर्ती नहीं किया गया। कोरोना वायरस के चलते सभी अस्पतालों में बिस्तर भरे थे। यहां तक कि अपोलो और मैक्स अस्पताल ने भी उनके भाई को भर्ती करने से साफ इंकार कर दिया था।
दोनों ही अस्पतालों ने आईसीयू में जगह न होने का हवाला दिया था। जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना वायरस पर ध्यान देने की वजह से टीबी की निगरानी, जांच और उपचार पर काफी गंभीर असर पड़ा है। इससे एक वैकल्पिक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट भी पैदा हुआ है।
रोजाना कोरोना से ज्यादा मौतें टीबी संक्रमण से
पथ संगठन के वैश्विक तकनीकी टीबी निदेशक शिबू विजयन का कहना है कि गैर कोविड स्वास्थ्य सेवाओं पर काफी बुरा असर पड़ा है। जबकि हकीकत यह है कि कोरोना वायरस की तुलना में टीबी रोग चार गुना अधिक खतरनाक है। आज भी देश में हर दिन 1200 लोगों की इस संक्रमण के चलते मौत हो रही है।
जबकि रोजाना साढ़े सात हजार टीबी संक्रमित मरीज मिल रहे हैं। वहीं स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञ अनंत भान का कहना है कि महामारी के चलते गैर कोविड मरीजों को काफी परेशानियों को सामना करना पड़ा है। बच्चों का टीकाकरण, मातृत्व सुरक्षा और टीबी संक्रमण जैसे गंभीर विषयों पर भारत को काफी नुकसान हुआ है।
आंकड़ों पर गौर करें तो इसी साल के शुरुआती छह माह में करीब पांच लाख टीबी मरीजों की पहचान नहीं हो पाई है। जबकि 42 फीसदी टीबी मरीजों को सरकार से मिलने वाली पोषण राशि भी नहीं मिल सकी।
दिल्ली एम्स के वरिष्ठ पल्मोनरी विशेषज्ञ डॉ. करण मदान का कहना है कि राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम 2018 में मामलों का पता लगाने में 18 फीसदी और 2019 में 12 फीसदी वृद्धि हुई। उन्होंने कहा कि जहां देश साल 2025 तक टीबी से मुक्ति पाने के लिए संघर्ष कर रहा है। ऐसे में कोविड की वजह से आई रुकावट ने गंभीर चुनौती खड़ी की है।
शुरुआती छह माह की स्थिति
| माह |
नए टीबी केस |
कमी/बढ़ोत्तरी |
| जनवरी |
196603 |
0.2 फीसदी बढ़ोत्तरी |
| फरवरी |
212811 |
10 फीसदी बढ़ोत्तरी |
| मार्च |
167182 |
21 फीसदी कमी |
| अप्रैल |
81878 |
63 फीसदी कमी |
| मई |
117459 |
47 फीसदी कमी |
| जून |
150366 |
26 फीसदी कमी |
*(केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सेंट्रल टीबी डिवीजन के अनुसार)