जाति पूछे जाने पर सरकार से एम्स के डॉक्टर खफा हो गए हैं। इनका कहना है कि डॉक्टरों से जाति और धर्म पूछना गलत है। चिकित्सीय क्षेत्र में धर्म और जातिवाद से उठकर एक डॉक्टर मरीज की सेवा करता है। जबकि सरकार समाज के रक्षकों को ही इस तरह की दलदल में फेंकने का काम कर रही है।
वहीं, एम्स प्रबंधन का कहना है कि मंत्रालय से आदेश मिलने के बाद ही सभी विभागाध्यक्षों से ये ब्यौरा मांगा गया था। प्रबंधन स्तर पर इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं है। साथ ही प्रबंधन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ये बताया कि सरकारी खानापूर्ति के लिहाज से ही केंद्रीय अस्पतालों में मौजूद स्टॉफ की जानकारी मांगी जाती है। इसे फिजूल में अलग दिशा दी जा रही है।
दरअसल, डीओपीटी ने एम्स प्रबंधन से फैकल्टी से जुड़ी जानकारियां मांगी हैं। इसके लिए एक फॉर्म दिया है, जिसे सभी फैकल्टी को भरना है। प्रबंधन ने एक निर्देश जारी करते हुए इस फॉर्म को कुछ दिन पहले संलग्न कर सभी विभागों को भेज दिया। फॉर्म में नाम, विभाग, उम्र, पते के साथ जाति और धर्म के बारे में भी जानकारी देने का विकल्प दिया है।
डॉक्टरों को इन्हीं विकल्प पर ऐतराज है। कहा जा रहा है कि जाति और धर्म की आड़ में एक डेटा तैयार किया जा रहा है। इन सब के बीच डॉक्टरों का विरोध बढ़ता देख प्रबंधन की ओर से भी फॉर्म में गलती होने का जिक्र किया जा रहा है। हालांकि, प्रबंधन का कहना है कि विभागीय निर्देश मिलने के बाद इसे आगे विभागों को भेज दिया था। किसी भी वरिष्ठ डॉक्टर ने आगे आकर आपत्ति नहीं जताई है। हालांकि कहा ये भी जा रहा है कि फॉर्म में त्रुटि दूर करके दोबारा फैकल्टी को भेजा जा सकता है।