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AI Summit: एआई से हो रही शहर के सबसे गर्म हॉटस्पॉट्स की पहचान, कूल रूफ से तापमान 2 से 4.5 डिग्री तक होगा कम

Wed, 18 Feb 2026 05:49 AM IST
दुष्यंत शर्मा नितिन राजपूत, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

गर्मी और हीटवेव के खतरे के बीच अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) शहरों के सबसे ज्यादा गर्म इलाकों यानी हॉटस्पॉट की सटीक पहचान करने में अहम भूमिका निभा रहा है।
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demo - फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
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जलवायु परिवर्तन की वजह से बढ़ती गर्मी बड़ी समस्या बन गई है। खासकर टिन, एस्बेस्टस या कंक्रीट से बनी झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोग गर्मी से बहुत परेशान होते हैं। गर्मी और हीटवेव के खतरे के बीच अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) शहरों के सबसे ज्यादा गर्म इलाकों यानी हॉटस्पॉट की सटीक पहचान करने में अहम भूमिका निभा रहा है।

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डेटा और सैटेलाइट इमेज के विश्लेषण से यह तकनीक उन क्षेत्रों को चिन्हित कर रही है, जहां तापमान असामान्य रूप से अधिक रहता है। इसके साथ ही कूल रूफ जैसी पहल के जरिये इन इलाकों में तापमान 2 से 4.5 डिग्री सेल्सियस तक कम करने के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं, जिससे लोगों को राहत मिलने की उम्मीद बढ़ी है। यह मॉडल भारत मडंपम में चल रहे एआई इम्पैक्ट समिट में महिला हाउसिंग ट्रस्ट की ओर से प्रदर्शित किया है।

महिला हाउसिंग ट्रस्ट की डेवलपमेंट सेक्टर एक्सपर्ट श्रुति मोतीवाल ने बताया कि संस्था गरीब महिलाओं और शहरी समुदायों को जलवायु परिवर्तन से बचाने के लिए एआई का इस्तेमाल कर रही है। उन्होंने बताया कि यह एक एआई-पावर्ड मॉडल है, जो सैटेलाइट डेटा का विश्लेषण करके शहरों के अर्बन हीट आइलैंड्स यानी उन इलाकों की पहचान करता है, जहां मानवीय गतिविधियों और इमारतों की वजह से तापमान ज्यादा रहता है।
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राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के साथ भी शुरू
श्रुति के अनुसार, शहरों में बढ़ती गर्मी और हीटवेव के खतरे को देखते हुए उन्होंने हीट रिस्क एनालिसिस के लिए एक खास डिजिटल डैशबोर्ड तैयार किया है। इस डैशबोर्ड के जरिए अलग-अलग इलाकों में गर्मी के जोखिम का आकलन किया जाता है और जरूरत के मुताबिक कार्रवाई की योजना बनाई जा सकती है। इस डैशबोर्ड को नीति-निर्माताओं और संबंधित सरकारी विभागों के साथ साझेदारी के तहत साझा करता है। यह प्लेटफॉर्म आम जनता के लिए फिलहाल खुला नहीं है, लेकिन जिन नगर निगमों के साथ साझेदारी होती है, उन्हें डेटा और डैशबोर्ड की पूरी जानकारी मुफ्त में उपलब्ध कराई जाती है। फिलहाल, यह डैशबोर्ड राजस्थान के चूरू, वाराणसी और इंदौर नगर निगम के साथ लॉन्च किया जा चुका है। इसके अलावा इसे राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के साथ भी शुरू किया गया है।

हो चुका है पीरक्षण...
गुजरात महिला आवास सेवा ट्रस्ट के एक अध्ययन के अनुसार, शहर की बढ़ती गर्मी से राहत पाने के लिए एमएचटी ने चार तरह की कूल रूफ तकनीकों का परीक्षण किया। इनमें मॉड रूफ यानी रिसाइकल प्लास्टिक से बना मॉड्यूलर रूफिंग सिस्टम सबसे प्रभावी पाया गया, जिसने टिन या एस्बेस्टोस की छतों की तुलना में करीब 4.5 डिग्री सेल्सियस कम तापमान बनाए रखा। एयर-लाइट वेंटिलेशन शीट, जिसे टिन की छत पर लगाया जाता है, ताकि हवा का प्रवाह बना रहे, रिपोर्ट में कम प्रभावी साबित हुई और कुछ मामलों में तापमान बढ़ता भी पाया गया।

अध्ययन के अनुसार, सोलर रिफ्लेक्टिव व्हाइट पेंट, जिसे टिन की छत पर लगाया गया, सूरज की किरणों को परावर्तित कर लगभग 1 डिग्री तक तापमान कम करने में सहायक रहा। वहीं, एस्बेस्टस छत के नीचे लगाई गई थर्मोकूल सीलिंग से करीब 2.5 डिग्री तक कमी दर्ज की गई और इसका असर कंक्रीट छत के बराबर पाया गया। थर्मल इमेजिंग से यह भी सामने आया कि दोपहर में छतों का तापमान सबसे अधिक होता है, लेकिन कूल रूफ तकनीकों से इसमें स्पष्ट कमी आती है। खास बात यह है कि ये सभी उपाय अपेक्षाकृत सस्ते हैं और निम्न आय वर्ग के परिवार भी इन्हें आसानी से अपना सकते हैं।

महिलाओं की अगुवाई में एआई से जलवायु बदलाव पर चर्चा
भारत मंडपम में चल रहे इंडिया एआई इंपैक्ट समिट 2026 में मंगलवार को एमएचटी ने एक महत्वपूर्ण पैनल चर्चा आयोजित की। इसका विषयसमुदाय की अगुवाई वाली एआई पहलों से जलवायु सहनशीलता को मजबूत बनाना रहा। एमएचटी ने महिलाओं की नेतृत्व वाली दो केस स्टडीज साझा कीं, जो एआई और स्थानीय डेटा से गर्मी के जोखिमों से निपटने पर आधारित हैं। पैनल में चर्चा हुई कि एआई और महिलाओं की भूमिका से शहरों में गर्मी के खतरे कैसे कम किए जा सकते हैं।

विशेषज्ञों ने बताया कि सरकार, व्यापार और समाज मिलकर स्केलेबल समाधान बना सकते हैं। मुख्य बिंदुओं में एआई के क्षेत्र में उभरते नए ट्रेंड्स और विकास से जुड़े नवाचारों पर विशेष ध्यान दिया गया। इस बात पर विचार किया गया कि एआई तकनीक को बड़े पैमाने पर कैसे लागू किया जाए, ताकि समाज को व्यापक स्तर पर लाभ मिल सके। जलवायु सहनशीलता बढ़ाने में एआई की संभावनाओं और उसके सामने आने वाली चुनौतियों पर भी चर्चा हुई। साथ ही, एआई क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के उपायों पर जोर दिया गया। बैठक में लिंग संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाते हुए समावेशी विकास के लिए एक मजबूत और संतुलित ढांचे की आवश्यकता पर भी सहमति जताई गई।
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