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दिल्ली-एनसीआर की आबोहवा बिगाड़ रहे ईंट-भट्ठे और थर्मल प्लांट, नहीं हो रहा नियमों का पालन

Thu, 05 Jul 2018 08:42 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
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ईंट-भट्ठे और थर्मल पावर प्लांट लगातार शहर की आबोहवा बिगाड़ रहे हैं। तमाम आदेशों के बावजूद दिल्ली-एनसीआर में करीब 83 फीसदी थर्मल पावर प्लांट उत्सर्जन मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं। साथ ही 3 हजार से अधिक मौजूद ईंट-भट्ठे अपनी चिमनियों को प्रभावी तौर पर जिग-जैग तकनीक में ढ़ाल रहे हैं। इतना ही नहीं भट्ठियों में सस्ते ईंधन के तौर पर प्लास्टिक और अन्य प्रदूषण फैलाने वाले तत्वों का बेधड़क इस्तेमाल किया जा रहा है। यह जानकारी सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट (सीएसई) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में दी है।

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सीएसई के उप महानिदेशक चंद्रभूषण ने बताया कि दिल्ली-एनसीआर में आबोहवा की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से जारी दीर्घ अवधि वाली योजना भी ठंडी बस्ते में चली गई है। सुप्रीम कोर्ट और पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (ईपीसीए) के हस्तक्षेप के बावजूद नियमों और मानकों को लागू करने में एजेंसियां फिसड्डी साबित हो रही हैं। मसलन 2019 तक दिल्ली के 300 किलोमीटर के दायरे में मौजूद 83 फीसदी थर्मल पावर प्लांट उत्सर्जन मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं।
 
दिल्ली-एनसीआर में ईंट-भट्ठों की हालत  
सीएसई के मुताबिक दिल्ली-एनसीआर में वैध रूप से कुल 3000 ईंट-भट्ठे संचालित हो रहे हैं। करीब 1000 ईंट-भट्ठों की चिमनियों को जिग-जैग तकनीकी में ढाला जा चुका है। वहीं, 1500 ईंट-भट्ठों के सचालकों ने ईपीसीए को हलफनामा देकर अक्तूबर तक अपनी चिमनियों को ठीक करने का वादा किया है। जबकि अन्य ईंट-भट्ठों ने अपनी चिमनी को जिग-जैग करने के संबंध में स्थिति ही नहीं स्पष्ट की है। इनमें केवल 20 फीसदी ने चिमनी को प्रभावी और गुणवत्ता मानकों पर जिग-जैग किया है। जबकि 30 फीसदी ऐसी चिमनियां हैं जिन्हें औसत स्तर पर जिग-जैग बनाया गया है वह सिर्फ 20 से 30 फीसदी ही उत्सर्जन नियंत्रण करने में सक्षम हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने हाल ही में इस पर सर्वे भी किया है।
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क्या है जिग-जैग चिमनी 
ईंट-भट्ठों की चिमनियों से निकलने वाले धुएं और प्रदूषण के कणों को कम करने के लिए चिमनियों को जिग -जैग (टेढ़ा-मेढ़ा) बनाया जाता है। इससे प्रदूषण काफी हद तक वातावरण में आने से रुक जाता हैं। यदि प्रभावी और गुणवत्ता मानकों पर चिमनी को जिग-जैग बनाया गया है तो 50 से 70 फीसदी उत्सर्जन रुक सकता है।
   
उत्सर्जन मानकों का पालन नहीं कर रहे पावर प्लांट
वर्ष 2015 में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने सभी कोयला पावर प्लांट को निर्देश दिया था कि वह दो वर्षों में उत्सर्जन मानकों का पालन करें। समयसीमा समाप्त होने के बावजूद पावर प्लांट मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं। अब  दोबारा 2019 दिसंबर तक इन प्लांटों को मानक के अनुरूप ढालने का आदेश दिया गया है लेकिन सीएसई की रिपोर्ट के मुताबिक 83 फीसदी पावर प्लांट इस समयसीमा में तय उत्सर्जन मानक का पालन नहीं कर पाएंगे। सल्फर डाईऑक्साइड और अन्य प्रदूषक तत्व इन पावर प्लांट के जरिए दिल्ली-एनसीआर की हवा में घुल रहे है।  

सीएसई की अपील 
सीएसई ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अपील किया है कि वे ईंट-भट्ठों और कोयला पावर प्लांट संचालकों को उत्सर्जन मानकों का पालन कराने के लिए तत्काल और सख्त कदम उठाएं ताकि दिल्ली-एनसीआर की आबोहवा को बेहतर बनाने में मदद मिल सके। 

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