गंगा ढाबा और जेएनयू के पत्थर... मुझे 36 साल पहले की बहुत यादें तो ताजा नहीं हैं पर अपने गुरु होने पर गर्व महसूस कर रहा हूं। जेएनयू से ऐसा नाता रहा कि लाख चाहने पर भी कोई भूल नहीं सकता है। फिर चाहें एक प्रोफेसर के रूप में मैं (प्रो. अंजन मुखर्जी) या फिर प्रोफेसर व जेएनयू के पूर्व छात्र व नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी।
जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर कहते हैं कि जेएनयू से अभिजीत का नाम कभी छूटा ही नहीं। एक इंटरव्यू में खुद अभिजीत ने इस बात को माना था । अभिजीत ने कहा था कि मेरे परिजन दिल्ली ऑफ इकोनॉमिक्स में दाखिला दिलाना चाहते थे पर मुझे जेएनयू की खूबसूरती व सादगी ने जकड़ लिया। यहां बेबाक राय औरों से अलग थी। किसी भी मुद्दे पर अपनी बात कहने का साहस देना जेएनयू से मिला। इसी लेख में अभिजीत ने मेरा जिक्र किया। तब लगा कि मैं कुछ भूल रहा था। हर मुद्दे पर जब उनसे जेएनयू का नाम जुड़ता तो वह उसी तर्ज पर उससे जुड़ने पर गर्व भी महसूस करते।
जेएनयू के पूर्व छात्र आनंद का कहना है कि हम उनसे मिले नहीं थे पर नोटबंदी पर जब मोदी सरकार की आलोचना की, तब जाकर उनके बारे में पता चला। इसी दौरान पता चला कि उन्हें गंगा ढाबा बेहद पसंद था। यहां दोस्तों के साथ बैठकर गप्पे मारते हुए खाना खाना, पत्थरों पर पढ़ाई के साथ गाने गाना भी बेहद पसंद था। जब भी कैंपस में विरोध प्रदर्शन होता है तो पता चलता है कि ऐसा इससे पहले 1983 में एडमिशन रिफॉर्म को लेकर प्रदर्शन के दौरान तीन सौ छात्रों को गिरफ्तार किया गया था, उसमें अभिजीत भी शामिल थे। अभिजीत करीब दस दिन तक तिहाड़ जेल में रहे थे।