15 मई 2008 की रात नोएडा के सेक्टर-25 स्थित जलवायु विहार के फ्लैट नंबर एल-32 में हुई आरुषि-हेमराज की हत्या अगर तलवार दंपति ने नहीं की थी तो फिर कातिल कौन है। क्या उस रात कोई बाहरी व्यक्ति घर में आया था, ये सवाल अब भी खड़ा है। आरुषि की हत्या के दूसरे दिन उसी की फ्लैट की छत से नौकर हेमराज का शव बरामद कराने वाले यूपी पुलिस के पूर्व डीएसपी और इस केस के अहम गवाह रहे केके गौतम ने सभी मुद्दों पर अमर उजाला से विशेष बातचीत की। प्रस्तुत है प्रमुख अंश :
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सीबीआई भी इस केस में कुछ साबित नहीं कर पाई?
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हाईकोर्ट के फैसले पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
उच्च न्यायालय के फैसले का सम्मान करना चाहिए। न्यायालय ने काफी लंबी और धैर्यपूर्ण सुनवाई करने के बाद फैसला सुनाया है। फैसला एकदम सही है, क्योंकि तलवार दंपति के खिलाफ कोई सबूत नहीं हैं।
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दूसरे दिन आपको किसी बाहरी व्यक्ति के होने का आभास हुआ था
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file photo
- फोटो : अमर उजाला
नोएडा पुलिस की जांच के बारे में क्या कहेंगे?
नोएडा पुलिस के जांच अधिकारी तत्कालीन थाना सेक्टर-20 प्रभारी दाताराम ननौरिया ने इस केस में सबसे बड़ी चूक की है। उन्हें पहले दिन ही छत और आसपास की बारीकी से जांच कर लेनी चाहिए थी। इसके अलावा सबूत एकत्र करने में भी एक के बाद एक कई चूक हुई हैं।
किन वजहों से ये केस मर्डर मिस्ट्री बन गया
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arushi murder case
सीबीआई ने बहुत गंभीरता से मामले की जांच की। उनकी 50-50 लोगों की टीम आती थी। टीम ने घर के शौचालयों की पाइप लाइन से लेकर सेक्टर के पीछे बह रहे नाले तक को खंगाल डाला था। हालांकि टीम एक-डेढ़ माह बाद घटनास्थल पर पहुंची थी। तब तक बारिश भी हो चुकी थी घर के अंदर धुलाई भी हो चुकी थी। इससे सभी फॉरेंसिक सबूत नष्ट हो चुके थे। सीबीआई का कोई कसूर नहीं है। उन्होंने तो क्लोजर रिपोर्ट लगाई थी, कोर्ट ने उसके आधार पर ट्रायल शुरू किया था।
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arushi talwar
कहा जा रहा कि आप पर सीबीआई का दबाव था बयान बदलने के लिए?
नहीं, ये सच नहीं है। सीबीआई ने मुझ पर बयान बदलने का कोई दबाव नहीं बनाया था। उन्होंने सही बयान देने को ही कहा था।
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आरुषि
- फोटो : SELF
तलवार दंपति को पूर्व में किन आधार पर आरोपी बनाया गया था?
नोएडा पुलिस ने हत्याकांड के आठ दिन बाद 23 मई 2008 को राजेश तलवार को हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था। वह चार महीने तक जेल में रहे, लेकिन जांच में कुछ नहीं मिला और वह रिहा हो गए। इसके बाद भी पांच साल तक सीबीआई ने केस की जांच की, लेकिन तलवार दंपति के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला। यही वजह है कि सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट लगा दी थी। उस वक्त तक इतना मीडिया ट्रायल हो चुका था कि उसकी वजह से तलवार दंपति को सजा हो गई।
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15 मई 2008 की रात आरुषि की हत्या हुई थी। 16 मई 2008 की सुबह उसका शव मिला। उसी दिन तलवार दंपति बेटी का अंतिम संस्कार करने के बाद अस्थियां विसर्जित करने हरिद्वार निकल गए थे। 17 मई 2008 की सुबह एक डॉ. मित्र का फोन आया। उन्होंने तलवार दंपति के घर चलने को कहा। मैं पहले से पीड़ित परिवार को नहीं जानता था। मेरे डॉ. मित्र ही पीड़ित परिवार के परिचित थे। घर पहुंचकर मैं छत की तरफ गया। वह छत के गेट पर ताला लगा था और खून के निशान थे। इसके बाद उन्होंने उस वक्त के पुलिस अधिकारियों को फोन कर छत से हेमराज का शव बरामद कराया था। इस दौरान हेमराज के कमरे से शराब के तीन गिलास मिले थे। इसके अलावा पूरे घर का मुआयना करने के बाद ऐसा प्रतीत हो रहा था कि कोई बाहरी व्यक्ति हत्या की रात घर में आया था।
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हेमराज का शव अगर पहले दिन ही मिल जाता तो शायद आज इस केस का रुख कुछ और होता। इस तरह के केस में शुरुआती कुछ क्षण सबूत एकत्र करने और संदिग्धों से बात करने के लिए काफी अहम होते हैं, जो इस केस में नहीं हुआ। जब तक फॉरेंसिक साक्ष्य जुटाए जाते वह नष्ट हो चुके थे।
दो फिंगर प्रिंट का नहीं हुआ था मिलान
आरुषि-हेमराज हत्याकांड में घटना स्थल से फॉरेंसिक टीम ने फिंगर प्रिंट के कुल 24 नमूने लिए थे। इनमें से 22 नमूनों का मिलान संबंधित व्यक्तियों से हो गया था। उनकी भूमिका की जांच ही हो चुकी है। ये सभी लोग वो हैं जो आरुषि की हत्या के बाद तलवार दंपति के घर पहुंचे थे। फिंगर प्रिंट के दो नमूने ऐसे हैं जिनका मिलान अब तक नहीं हो सका है। इसमें से एक निशान छत की दीवार पर हेमराज के शव के पास खून से सने हुए सीधे हाथ के पंजे के तौर पर मिला था।