जस्टिस संजीव खन्ना व जस्टिस चंद्रशेखर के समक्ष विधायकों के वकील मोहन परासरन ने कहा था कि जिन विधायकों को संसदीय सचिव बनाया गया था, उनकी नियुक्ति हाईकोर्ट ने रद्द कर दी थी। इसके अलावा इन विधायकों को कोई लाभ नहीं दिया गया।
इस बाबत चुनाव आयोग को 9 मई 2016 को जानकारी दी गई थी, लेकिन उस जवाब की व्याख्या सही तरीके से नहीं की गई। विधायकों की ओर से कहा गया कि संसदीय सचिव केवल एक पद था और उन्हें किसी तरह का कोई अधिकार भी नहीं दिया गया था। विधायकों ने न कभी सरकारी वाहन का इस्तेमाल किया और न किसी तरह का शुल्क लिया।