- आसपास के लोग दोनों को पति-पत्नी के तौर पर ही जानते थे
- युवक की पहली शादी की तलाक की प्रक्रिया पूरी नहीं होने के कारण युवती ने दर्ज कराई थी एफआईआर
- एफआईआर रद्द कराने की मांग पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी, अदालत ने कहा यौन शोषण के वास्तविक पीड़ितों के न्याय में बाधा हैं ऐसी शिकायत
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने एक फैसले में सहमति संबंध से संबंधित एक मामले में दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया है। यह मामला सहमति संबंध पार्टनर के बीच 15 साल पुराने रिश्ते से जुड़ा था, जिसमें शिकायतकर्ता ने गलतफहमी के आधार पर युवक के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। कोर्ट ने शिकायतकर्ता पर कानून का दुरुपयोग करते हुए एफआईआर दर्ज कराने और न्यायिक समय खराब करने पर नाराजगी जताई। अदालत ने शिकायतकर्ता पर 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है।
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट को बताया गया कि अनिल वर्मा और शिकायतकर्ता पिछले 15 वर्षों से रिलेशनशिप में थे और 2019 से एक साथ रह रहे थे। दोनों को स्थानीय लोग पति-पत्नी के रूप में जानते थे। हालांकि, अनिल वर्मा की कानूनी पत्नी से तलाक की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई थी। इस कारण कुछ गलतफहमियों के चलते शिकायतकर्ता ने उनके खिलाफ पुलिस स्टेशन प्रशांत विहार में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता ने कोर्ट में स्वीकार किया कि शिकायत गलतफहमी और उस समय उनकी भावनात्मक व स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण दर्ज की गई थी। उन्होंने कहा कि वह अब इस मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहती हैं। दूसरी ओर, दिल्ली सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त लोक अभियोजक ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इस तरह के समझौते यौन शोषण जैसे गंभीर आरोपों को कमजोर करते हैं और महिलाओं के लिए कानूनी सुरक्षा को प्रभावित करते हैं। कोर्ट ने दोनों पक्षों के तर्क सुनने और मामले की जांच के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि शिकायतकर्ता ने स्वेच्छा से रिलेशनशिप में रहते हुए यह शिकायत दर्ज की थी। अब वह इसे आगे नहीं बढ़ाना चाहती। कोर्ट ने माना कि ऐसी स्थिति में आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसलिए एफआईआर को रद्द करने का आदेश दिया गया।
कोर्ट ने कहा कानून का दुरुपयोग ना किया जाए
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गंभीर आरोपों वाली शिकायत को लापरवाही से दर्ज नहीं किया जाना चाहिए। इस कारण, शिकायतकर्ता पर 20,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया, जो दिल्ली हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी में चार सप्ताह के भीतर जमा करना होगा।