अदालत ने पुलिस हिरासत में हुई मौत के मामले में चार पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराते हुए उन्हें सात-सात वर्ष कैद की सजा सुनाई है। दोषियों पर ढाई लाख रुपये जुर्माना भी लगाया गया है। कोर्ट ने यह राशि पीड़ित परिवार को बतौर मुआवजा अदा करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि दोषियों ने एक अनमोल जीवन लिया है जिसे भुलाया नहीं जा सकता।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश दिग्विनय सिंह ने हाल ही में सुनाए अपने फैसले में हेड कांस्टेबल भगवान, हेड कांस्टेबल उज्जागर सिंह, कांस्टेबल श्रीपाल व सियाराम को सजा सुनाई है। वहीं पांचवें आरोपी कांस्टेबल चमन लाल की सुनवाई के दौरान वर्ष 2006 में मृत्यु हो गई। यह घटना 1999 की है। उस वक्त सभी दोषी थाना अलीपुर में तैनात थे।
अदालत ने कहा कि सभी कानून के संरक्षक थे लेकिन उन्होंने पुलिस थाने में एक निर्दोष पर इतना अत्याचार किया कि उसने दम तोड़ दिया।
अदालत ने कहा कि सभी तथ्यों व साक्ष्यों से स्पष्ट है कि मृतक पुलिस थाने की चार दीवारों के भीतर यातना के दौरान अत्यधिक दर्द के दौर से गुजरा। अदालत ने बचाव पक्ष के उस तर्क को खारिज कर दिया कि उनके मुवक्किलों को जेल नहीं भेजा जाना चाहिए और इसके बजाय मुआवजा राशि में वृद्धि कर दी जाए। अदालत ने कहा कि हिरासत में मौत एक गंभीर अपराध है और अदालत का मानना है कि ऐसे मामलों में अपराधियों को कड़ी सजा दी जानी चाहिए ताकि समाज में संदेश जाए कि अपराधी कानून से बच नहीं सकता।
अभियोजन पक्ष के अनुसार अली पुर थाने में तैनात पांचो दोषियों ने मृतक महेंद्र सिंह को कथित तौर पर 15 अगस्त 1999 को नकली मुद्रा रखने के आरोप में अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था। हिरासत में उसकी मौत हो गई थी।