ये कहावत तो आप सभी ने जरूर सुनी होगी कि बच्चू ये काम बच्चों का खेल नहीं है, लेकिन ये खबर इस कहावत को उल्टा करने वाली है। 35 महीने की एक छोटी सी बच्ची ने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है जिसे सुनकर हैरान रह जाएंगे।
बड़े से बड़े तीरंदाजों के अंदाज आपको लुभाते होंगे लेकिन इस नन्हीं तीरंदाज का अंदाज बिल्कुल जुदा है। उम्र भले ही अभी तीन साल की भी पूरी ना की हो, लेकिन इसका आत्मविश्वास आपको चौंका सकता है।
जिस उम्र में बच्चे खिलौने से खेलते हैं उस उम्र में ये नन्हीं सी डॉली सटीक निशाना लगाना जानती है। डॉली शिवानी चेरुकुरी नाम है इस बच्ची का जिसने तीरंदाजी में एक राष्ट्रीय रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है।
लिम्बा बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हो गया नाम
डॉली का नाम लिम्बा बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज किया जा चुका है। दिल्ली में रहने वाली ये छोटी सी तीरंदाज सरोगेसी (किराए की कोख) से पैदा हुई।
पिता चेरुकुरी सत्यनारायण अपनी छोटी सी बच्ची की सफलता से फूले नहीं समा रहे हैं। बोले कि जब रिकॉर्ड की बारी आई तो डॉली ने पांच से सात मीटर की दूरी से 24 बार लगातार कोशिश की।
इस दौरान उसने 72 तीर छोड़े और उसे 200 प्वाइंट मिले। चेहरे पर मासूमियत लिए इस छोटी सी डॉली को देखकर कोई ये नहीं कह सकती है कि इसके तीरों में एकलव्य जैसा ध्यान है।
जन्म से ही खिलौना नहीं थाम लिया था तीर-कमान
पिता की बातों पर गौर करें तो हैरानी अपने आप बढ़ती जाती है। कहते हैं कि डॉली शुरू से ही अन्य खिलौने से खेलने की बजाय तीर-कमान से ही खेलती थी। 9 दिन बाद डॉली का जन्मदिन है लेकिन उसने अपने मां-बाप को उससे पहले ही एक खास तोहफा दे दिया है।
वो आसानी से निशाना लगा सके इस वजह से हमने उसे कार्बन से बने तीर-कमान ला कर दे दिए। डॉली के पिता तीरंदाजी की एकेडमी चलाते हैं, और यहीं से डॉली के मन में हुनर पैदा हो गया और उसने इसे साकार कर दिखाया।
2010 में जान गंवा चुका डॉली का बड़ा भाई अंतरराष्ट्रीय तीरंदाज और कोच था। इसके बाद सरोगेसी की मदद से बच्चे की चाहत दिखाई तो डॉली का जन्म हुआ। बेटे से पहले भी दंपति की एक बेटी थी, लेकिन उसकी भी मौत हो चुकी है।