नई दिल्ली। राजधानी के रवींद्र भवन परिसर में साहित्य अकादमी की तरफ से आयोजित साहित्योत्सव-2026 के पांचवें दिन शुक्रवार को विविध साहित्यिक गतिविधियों की समृद्ध झलक देखने को मिली। दिनभर चले 20 सत्रों में देशभर से आए 100 से अधिक साहित्यकारों, विद्वानों और प्रतिभागियों ने सक्रिय सहभागिता की। इस दौरान, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में साहित्य की भूमिका: विशेष संदर्भ-वंदे मातरम् के 150 वर्ष, विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी के चार सत्र आयोजित हुए। पहले सत्र में सोमा बंद्योपाध्याय ने कहा, कि भारतीय साहित्य ने न केवल स्वतंत्रता आंदोलन का साथ दिया, बल्कि उसकी आत्मा को भी आकार दिया। वहीं भैरव लाल दास ने बंकिमचंद्र के वन्दे मातरम् को राष्ट्र के लिए प्रेरणादायक मंत्र बताया। श्रीकला मुल्लास्सेरी ने इसे एक सशक्त सांस्कृतिक स्मृति करार देते हुए कहा कि यह गीत आज भी राष्ट्रीय चेतना को जागृत करता है। वहीं, सत्र की अध्यक्षता करते हुए सुरेंद्र दुबे ने कहा, कि वंदे मातरम के उद्घोष ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारियों में अद्भुत ऊर्जा का संचार किया और उन्हें संघर्ष के लिए प्रेरित किया।
भाषाई विविधता में एकता पर विमर्श : भारतीय साहित्यिक रचनाओं में सांस्कृतिक विविधता का प्रतिबिंबन, विषय पर आयोजित पैनल चर्चा में रवेल सिंह के संयोजन में लीलाधर मंडलोई, अजय कुमार झा, चंद्रप्रकाश देवल, एस. रंगनाथ और राजेश आसुदानी रकीब ने विचार रखे। इस दौरान, वक्ताओं ने कहा कि भारतीय भाषाओं का साहित्य भले ही अलग-अलग संदर्भों में विकसित हुआ हो, लेकिन उसमें निहित मूल भाव एकता का ही है। चंद्रप्रकाश देवल ने कहा, कि साहित्य तभी सार्थक है जब वह लोक से जुड़ा हो, जबकि अजय कुमार झा ने भारतीय साहित्य को निरंतरता और आधुनिकता का संतुलित संगम बताया।