प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2025 तक भारत को टीबी मुक्त करने की घोषणा की थी। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए सरकार ने वर्ष 2018 से 2025 तक प्रत्येक साल मरीजों की पहचान कर उनका उपचार कराना तय किया था। हालांकि सरकारी तंत्र पहले ही साल में टीबी मरीजों को ठीक करने का लक्ष्य पूरा नहीं कर सका। बताया जाता है कि इसके पीछे निजी अस्पतालों की कम सक्रियता है।
रिपोर्ट के अनुसार इस साल 23 नवंबर तक देश में 17,99,838 मरीजों की पहचान हुई, जिनमें करीब 23 फीसदी 4,26,359 मरीजों की पहचान निजी अस्पतालों में हुई है। जबकि सरकार ने वर्ष भर में 30 लाख मरीजों की पहचान का लक्ष्य रखा था। इनमें 15-15 लाख मरीजों की रिपोर्टिंग सरकारी और निजी अस्पतालों को करनी थी। जानकारों की मानें तो मौजूदा हालात को देखकर सात वर्ष के भीतर देश को टीबी की बीमारी से मुक्त कराना मुश्किल लग रहा है।
इस वर्ष सबसे ज्यादा टीबी मरीजों की पहचान उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश से हुई है। इन राज्यों में निजी अस्पतालों से करीब 28 फीसदी मरीजों की पहचान हुई है। बिहार और यूपी में क्रमश: 40 और 19 फीसदी निजी अस्पतालों ने टीबी मरीजों को लेकर गंभीरता दिखाई है।
इन राज्यों में कम मिले मरीज
इस साल हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, गोवा, असम, अरुणाचल प्रदेश, चंडीगढ़, केरल, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा जैसे राज्यों में सबसे कम टीबी मरीजों की जानकारी मिली है। जबकि पंजाब, उत्तराखंड, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, दिल्ली, छत्तीसगढ़ में निजी अस्पतालों से टीबी मरीजों की जानकारी कम मिली है।