क्या बोले डॉक्टर
बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. सुरेंद्र सिंह बिष्ट ने बताया कि रक्त परीक्षण और आईएचबीएएस के सहयोग से एनसीवी जांच कर बीमारी की पुष्टि हुई। बीमारी तेजी से बढ़ने के कारण मरीज को सांस लेने में परेशानी हुई और उसे तुरंत वेंटिलेटर पर रखना पड़ा। लंबे समय तक श्वसन सहायता की आवश्यकता होने पर ट्रेकियोस्टॉमी की गई।
इंट्रावेनस इम्यूनोग्लोबुलिन की 10 डोज दी गईं
डॉ. बिष्ट ने बताया कि मरीज को इंट्रावेनस इम्यूनोग्लोबुलिन की 10 डोज दी गईं। प्रत्येक डोज की कीमत करीब 15 हजार रुपये थी। इसके साथ फीडिंग ट्यूब के माध्यम से पोषण दिया गया और नियमित फिजियोथेरेपी कराई गई। लगभग चार महीने बाद मरीज सामान्य भोजन करने लगा और धीरे-धीरे उसकी मांसपेशियों में ताकत लौट आई।
अपने पैरों पर चल रहा लक्षित
उप चिकित्सा अधीक्षक एवं रेडियोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. प्रशांत जैन ने बताया कि इलाज के दौरान मरीज को तीन बार कार्डियक अरेस्ट आया। हर बार डॉक्टरों, नर्सों और तकनीकी टीम ने तत्काल उपचार कर उसकी जान बचाई। करीब आठ महीने बाद ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब हटाई गई और अब मरीज अपने पैरों पर चलने लगा है।