सर गंगाराम अस्पताल के डाक्टरों ने जांघ के अंदर से विशाल ट्यूमर निकालने में सफलता हासिल की है। वाराणसी निवासी 18 वर्षीय प्रवीण कुमार गुप्ता का टयूमर कूल्हे से होता हुआ जांघ तक फैल गया था। ऑर्थोपेडिक्स, वैस्कुलर सर्जरी, प्लास्टिक सर्जरी व एनेस्थिसियोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों की टीम ने 12 किलो के टयूमर को निकालने में सफलता हासिल की। विशेषज्ञों ने मरीज की जांघ से टयूमर तो निकाला ही, पैर को कटने से भी बचाया। ट्यूमर निकालने के दौरान नस बीच में आ रही थी। मरीज की हालत में अब सुधार हो रहा है।
सर गंगाराम अस्पताल के ऑथोपेडिक्स ओन्को-सर्जन डॉ. बृजेश नंदन के मुताबिक, मरीज को 2012 में ट्यूमर हुआ था, जो धीरे-धीरे बढ़ता गया। बड़ा ट्यूमर होने के चलते मरीज को चलने-फिरने में दिक्कत के साथ दर्द भी अत्यधिक था। नसों व रक्त की धमनियों पर दबाव के कारण पूरी जांघ में कमजोरी आ चुकी थी। कई अस्पतालों में चक्कर काटने के बाद भी तकलीफ दूर नहीं हो पा रही थी। सभी पैर काटने की सलाह दे रहे थे। इसी के चलते ट्यूमर लगातार बढ़ता गया।
मरीज को अस्पताल में जांच के दौरान पता चला कि कूल्हे से होता हुआ ट्यूमर जांघ तक फैल चुका है। इसे निकालने के साथ-साथ अन्य अंगों को बचाना भी चुनौती था। इसी के चलते मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया। सात जनवरी को सात सर्जन की टीम ने ट्यूमर को निकाला। डॉ. नंदन के मुताबिक, मियामी विश्वविद्यालय में 2014 में ऐसा मामला आया था, लेकिन उस दौरान ट्यूमर छोटा था।
सर्जरी से एक दिन पहले ट्यूमर तक रक्त सप्लाई रोकी
वैस्कुलर एंड एंडोवस्कुलर विभाग के डॉ. अंबरीश सात्विक के मुताबिक, मरीज के ट्यूमर से होकर पैर व अन्य अंगों के लिए रक्त कोशिकाएं जा रही हैं। सर्जरी से एक दिन पहले एक विशेष विधि (प्री-ऑपरेटिव एंबोलिएशन) के द्वारा ट्यूमर को रक्त सप्लाई देने वाली नसों को बंद किया गया। हालांकि इस दौरान ध्यान दिया गया कि पैर को रक्त सप्लाई बाधित न हो। छोटी-सी गलती के चलते पैर काटना पड़ सकता था। डॉ. नंदन के मुताबिक, ट्यूमर नसों व रक्त कोशिकाओं के साथ चिपका हुआ था। सर्जरी के दौरान इन रक्त कोशिकाओं को बांध दिया गया। साढ़े नौ घंटे की सर्जरी के दौरान सिर्फ एक बोतल खून चढ़ाने की आवश्यकता पड़ी।