1- केजरीवाल ने समय पर भांप लिया था कि दिल्ली का तख्त छोड़ने से लोग नाराज हैं। उन्होंने मतदाताओं से सीधे माफी मांगी। इस फैसले को अपनी रणनीतिक चूक बताया और लोगों से कहा कि वह राजनीति में थोड़ा नासमझ थे। अब आगे ऐसा नहीं होगा। मतदाताओं से अपनी बात बहुत भोलेपन शैली में कही। मतदाताओं ने भी अपनी धारणा बदली। आप को फिर मौका देने का फैसला किया।
2- आप ने इस बार नकारात्मक प्रचार कम किया। उसके बड़े नेता अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया बहुत संयमित होकर प्रचार किया। किरण बेदी पर कुमार विश्वास ने कुछ टिप्पणी जरूर की, लेकिन पार्टी ने बार बार कहा कि वह किरणजी का सम्मान करती है। इसका असर लोगों में यह गया कि पार्टी किरण बेदी के नाम से बहुत भयभीत नहीं।
3- प्रचार तंत्र बहुत शानदार था आप पार्टी का। खासकर केजरीवाल पांच साल वाला गाना हिट हो गया। हाल के किसी भी फिल्मी गीत से एक पायदान ऊपर रहा यह गीत।
4- केजरीवाल और उनके लोगों ने जहां पीछा करने वाले सवाल थे उससे बड़ी सफाई से अपने को अलग किया, जहां जवाब देने की जरूरत थी, पूरी ताकत लगाई। आप पार्टी का होम वर्क काफी कुशल था। मुश्किल की एक दो घड़ी में भी वह विचलित नहीं हुई।
5- पानी बिजली झोपड़पट्टी का मसला आप पार्टी ने इस तरह उठाया कि भाजपा और कांग्रेस उसका मुकाबला नहीं कर सकी। लगा ये मुद्दे तो केजरीवाल के ही हैं।
6- पिछले एक साल से केजरीवाल और उनकी टीम एक तरह से प्रचार ही कर रही थी। दिल्ली के हर मतदाता तक पहुंचने की कोशिश की गई। केजरावाल मतदाताओं को अपने विश्वास में लेने में सफल रहे।
7- आप ने जिस तरह केजरीवाल को पार्टी नेता के तौर पर सामने रखा, उसका कोई जवाब भाजपा के पास अंत तक नहीं था। किरण बेदी आईं तब तक केजरीवाल अपना काम कर चुके थे। किरण बेदी के सामने आने पर आप पार्टी में थोड़ी सुगबुगाहट तो हुई पर जल्दी पार्टी ने अपने मनोबल को वापस पा लिया।
8- एक साथ दो खबरे थीं। एक तरफ केजरीवाल के लिए उत्साह आप कार्यकर्ता और नेता, दूसरी ओर किरण बेदी को लेकर भाजपा के अंदर बिखराब की खबरें। केजरीवाल अपने लोगों के बीच एकछत्र नेता के तौर पर उभरे।
9- केजरीवाल ने भाजपा को उसी के फेंके पांसे में फंसाने की नीति बनाई। चाहे कोई टिप्पणी हो या पोस्टर वार। केजरीवाल की रणनीति काम कर गई कि वापस वूमरंग की तरह भाजपा अपने ही फेंके सवाल से जूझती दिखी।
10 - केजरीवाल ने लोगों को यह अहसास कराया कि हर जगह भाजपा को देखा, दिल्ली में हमें एक और मौका देकर देखो। केजरीवाल ने हर तरह के वर्ग क्षेत्र जाति धर्म के लोगों को अपने साथ ले लिया। यहां तक कि भाजपा के परंपरागत वोटबैंक पर भी असर पड़ा। कई जगह कैडर वोट भी कुछ हद तक मतदान करने बूथ तक नहीं आया।