विधायक विमला बाथम जब संजय की मां सुदेवी से मिलीं तो उन्होंने बताया कि सुबह स्कूल भेजते समय उनका लाडला कह रहा था, "मां आज स्कूल जाने का मन नहीं है। मुझे स्कूल मत भेजो, लेकिन मैंने उसकी बात नहीं सुनी।"
वह आगे बताती हैं कि "मुझे क्या पता था कि बेटे का आज आखिरी दिन था। आखिरकार मेरा बच्चा सदा के लिए बिछड़ गया।" वहीं, विधायक ने कहा कि वह विधानसभा में नोएडा के स्कूलों के बारे में सवाल उठाएंगी कि हाईटेक शहर में ऐसे असुरक्षित अवैध स्कूल किसकी इजाजत से चल रहे हैं।
डायरी चेक करा रहे थे, अचानक ईंटें गिरने लगीं
‘मैदान में पेड़ के पास हम टीचर से डायरी चेक करा रहे थे कि अचानक दीवार से कुछ ईंट गिरीं। कुछ ही सेकंड में दीवार गिर गई।’ हादसे में घायल यूकेजी का छात्र हनी यह बताते हुए कांप रहा था। हादसे के बारे में बताते समय अस्पताल में भर्ती बच्चे बीच-बीच में कांप उठते और कुछ देर के लिए शांत हो जाते थे।
पूछने के बाद फिर वे आपबीती बताना शुरू करते। कक्षा तीन की छात्रा संध्या ने बताया कि उसको ईंटें लगीं, जिसके बाद होश नहीं रहा। अमित ने बताया कि उसे कई ईंटें लगी हैं। इसके बाद खून बहने लगा।
बच्चों की डायरी चेक कर रही टीचर पिंकी के सिर में भी चोट आई है। पिंकी ने बताया कि उन्हें संभलने का मौका ही नहीं मिला। मैदान में करीब 60 बच्चे बैठे हुए थे। स्कूल में कुछ कक्षाएं भी हैं, लेकिन उसमें तराई कराई गई थी। इस कारण बच्चों को बाहर मैदान में बैठाया गया था।
आधे घंटे तक मौके पर तड़पते रहे बच्चे
आरसीजे स्कूल गांव में संकरी गलियों के बीच बना हुआ है। यहां पर बड़ी गाड़ियां नहीं पहुंच सकती हैं। हादसे की सूचना के करीब आधे घंटे बाद मदद पहुंच पाई। इस दौरान घायल बच्चे मौके पर ही तड़पते रहे। हालांकि, कुछ बच्चों को आसपास के लोग क्लीनिकों में प्राथमिक उपचार के लिए ले गए थे।
पांच से 10 वर्ष तक के करीब 50 मासूम दीवार की चपेट में आ गए थे। इससे वहां बच्चों की चीख-पुकार मच गई। इस दौरान स्कूल में मौजूद अन्य छात्रों और आसपास के लोगों ने बच्चों को मलबे से निकाला। इस बीच बच्चों के परिजन भी वहां पहुंच गए और घायलों को पास के क्लीनिक और सेक्टर-49 के प्रयाग अस्पताल ले गए।
इस बीच कई बच्चे मौके पर पड़े तड़पते रहे। कुछ बच्चे होश में थे जबकि कुछ बेहोश। पुलिस की ओर से स्वास्थ्य विभाग को फोन किया गया, जिसके बाद अस्पताल से एंबुलेंस भेजी गई। सेक्टर-30 जिला अस्पताल से एंबुलेंस के वहां पहुंचने में करीब आधे घंटे लग गए।
वह मौत की नींद सो चुका था, माता-पिता ढूंढ रहे थे घायलों में
सात वर्षीय संजय का शव जिला अस्पताल के स्ट्रेचर पर कोने में पड़ा हुआ था और उसके परिजनों को ढूंढा जा रहा था। एक घंटे तक शव लावारिस हालत में पड़ा रहा। उसकी मां सुदेवी और पिता दिलीप कुमार अस्पताल में ही थे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि उनका बेटा अब इस दुनिया में नहीं रहा। रोते बिलखते माता-पिता घायलों में अपने बच्चे को ढूंढ रहे थे।
अस्पताल में बच्चों को ढूंढ रहे तमाम परिजनों को शव का कपड़ा हटाकर दिखाया जा रहा था। कांपते हाथों से माता-पिता शव पर से कपड़ा हटाकर चेहरा देखते और अपना बेटा न होने पर राहत की सांस लेते थे। इस दंपति को किसी ने कहा कि वहां जाकर चेहरा देख लें।
कांपती हालत में यह लोग शव के पास पहुंचे, जहां इन्हें कपड़ा हटाकर बच्चे का चेहरा दिखाया गया। चेहरा देखते ही सुदेवी बेसुध हो गईं। कुछ देर बाद उन्हें होश आया तो, हाय, मेरा बेटा कहकर शव को सीने से लगाकर रोने लगीं।
दिलीप ने बताया कि उनके तीन बेटे हैं। 10 साल का बड़ा बेटा अजय पांचवीं और आठ साल का नीरज इसी स्कूल में दूसरी कक्षा का छात्र है। संजय कक्षा एक में पढ़ता था। सुबह 7:30 बजे बच्चों के साथ संजय स्कूल जाता था और दोपहर दो बजे आता था। क्या पता था कि बच्चा अब कभी लौटकर नहीं आएगा। दिलीप ने बताया कि वह मजदूरी करता है। परिजनों ने स्कूल के प्रिंसिपल को जमकर कोसा, जहां बच्चों को कक्षा में न बैठाकर मैदान में पढ़ाया जा रहा था।
दो दिन से झुकी हुई थी दीवार
दीवार दो दिन से स्कूल की ओर झुकी हुई थी और किसी को भी दिखाई नहीं दी। स्कूल के बगल में मकान मालिक प्रवीन कई दिन से निर्माण करा रहा था। दीवार में दो दिन पहले मिट्टी भराई कराने से यह स्कूल की ओर झुक गई थी। इसको मकान मालिक और मिस्त्री- व ठेकेदार ने नजरअंदाज कर दिया।
दीवार झुकने के बाद दोबारा बनाने में मकान मालिक या ठेकेदार को नुकसान उठाना पड़ता। रुपये के लालच में इस बड़ी खामी को नजरअंदाज कर दिया गया। बृहस्पतिवार को दीवार की एक तरफ मिट्टी भराई का काम चल रहा था। इससे दीवार स्कूल की ओर झुकती चली गई।
कुछ मजदूरों ने इस पर आपत्ति भी की थी लेकिन ठेकेदार ने उनको चुप करा दिया। यहीं लापरवाही इतने बड़े हादसे का कारण बनी। अगर समय पर ये लोग चेत जाते तो हादसा नहीं होता। दरअसल, स्कूल की जमीन बगल में बन रही दीवार से नीचे थी। जैसे-जैसे दीवार से मिट्टी सटती गई, उसका झुकाव स्कूल की तरफ होता गया।