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पार्टी बदलने के बाद अब आर्य का सामना कई और चुनौतियों से

Thu, 19 Jan 2017 01:10 PM IST
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, हल्द्वानी
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yashpal arya
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कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में आए यशपाल आर्य के लिए चुनावी वैतरणी को पार करना इतना आसान नहीं है।
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अपने साथ ही अपने बेटे संजीव आर्य को टिकट दिला कर आर्य ने चुनाव प्रबंधन के इस दौर में दो नावों की सवारी भी कर ली है। आर्य के पार्टी बदलने से अब तक उनके लिए मुफीद रहे जातिगत समीकरण भी बदल गए हैं और आर्य को इसका नुकसान भी हो सकता है। कांग्रेस छोड़ने के बाद भी कांग्रेस में बड़ी टूट फूट न होना भी आर्य को चिंतित कर सकता है।

सोमवार को यशपाल आर्य ने अपने बेटे संजीव आर्य के साथ कांग्रेस का साथ छोड़ भाजपा को अपना लिया था। मंगलवार को उनकी पार्टी से विदाई के जवाब में कांग्रेस ने बाजपुर से भाजपाई सुनीता बाजवा को कांग्रेस में शामिल करवा कर दिया। सूत्रों की मानें तो कांग्रेस सुनीता बाजवा पर ही बाजपुर विधानसभा में दांव खेलेगी। यह अभी भविष्य के गर्भ में है कि दोनों के बीच मुकाबला कैसा रहेगा। इतना जरूर साफ है कि आर्य के लिए मुफीद रहे कई चुनावी समीकरण भी बदल गए हैं।
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कांग्रेस में यशपाल आर्य एक दलित नेता के रूप में भी स्थापित थे। दूसरी ओर, भाजपा कुमाऊं में दलित समर्थक पार्टी होने की छवि हासिल करने की कोशिश करती नजर आ रही है। ऐसे में पार्टी बदलने के बाद आर्य को अपनी इस दलित नेता की छवि को फिर से स्थापित करने के लिए प्रयास करना होगा। वह भी चुनाव के लिए बचे एक माह से कम समय में। बाजपुर में सुनीता बाजवा को उतार कर कांग्रेस ने आर्य के इसी कार्ड को भोथरा करने की कोशिश की है।

आर्य के सामने एक ही समय में दो चुनावों का प्रबंध करने की चुनौती भी होगी। संजीव आर्य का नैनीताल में यह पहला चुनाव है और आर्य को अपने चुनाव के साथ ही नैनीताल को भी समय देना होगा। बाजपुर के साथ ही नैनीताल भाजपा में उठ रहे विरोध के सुर उनकी राह को और मुश्किल कर सकते हैं।
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बाजपुर में ही भाजपा की सबसे बड़ी परेशानी मुस्लिम वोटों का साथ न मिलने की है। भाजपा में आने के बाद आर्य अब तक मिल रहे इस लाभ से भी वंचित होंगे। इसके लिए उन्हें अलग से मेहनत करनी होगी। मंगलवार को यह भी उभर कर समाने आया आर्य के समर्थक अभी कांग्रेस से नाता तोड़ने को बेताब नहीं है। पार्टी में खासी टूट फूट न होना कांग्रेस को राहत दे सकता है, पर आर्य के लिए यह चिंता का सबब बन सकता है।
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