बीते दिनों पर्वतपुत्र साहित्यकार मंगलेश डबराल की बीमारी की खबर सोशल मीडिया पर आई और जंगल में आग की तरह फैल गई थी। जीवन भर वामपंथ दर्शन को ओढ़ने-बिछाने और जीने वाले इस खांटी साहित्यकार के स्वस्थ होने की ईश्वर से प्रार्थना उन्हें हर जानने-पहचानने वाला कर रहा था।
वामपंथी साहित्यकार भी और भाजपा के वरिष्ठ नेता, सांसद और पदाधिकारी भी। एक बात पर सभी सहमत थे कि उन्होंने उत्तराखंड और पहाड़ को साहित्य के मामले में अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। प्रार्थनाएं निष्फल गईं। पहाड़ पर लालटेन की साहित्यिक रोशनी बिखेर कर आखिरकार मंगलेश डबराल चले गए।
मंगलेश का जन्म टिहरी जिले के चंबा ब्लॉक के गांव काफलपानी में हुआ था। इनके पिता मित्रानंद डबराल वैद्य थे। मगर साहित्यिक अभिरुचि संपन्न थे। उन्होंने गढ़वाली मुहावरों और लोकोक्तियों का एक कोश भी तैयार किया था। उन्होंने 200 साल का एक कैलेंडर भी तैयार किया था। मां सतेश्वरी देवी सामान्य गृहणी थीं। मंगलेश चार बहनों के बीच अकेले भाई थे।
पांचवीं तक ये गांव में पढ़े। बाद में इनका परिवार देहरादून आ गया। मंगलेश जी की कलम को धार देहरादून में ही मिली थी। यहां से प्रकाशित पत्र युगवाणी में उनकी पहली कविता छपी थी।
उस वक्त युगवाणी के संपादक आचार्य गोपेश्वर कोठियाल थे। गोपेश्वर कोठियाल और युगवाणी प्रेस से मंगलेश जी का जीवन भर का नाता जुड़ गया था। गोपेश्वर जी के बेटे संजय कोठियाल बताते हैं कि मंगलेश पहाड़, पहाड़ी लोगों और पहाड़ी व्यंजनों को किस कदर पसंद करते थे इसका ताजा उदाहरण यह है कि इसी दिवाली पर उन्होंने दिल्ली से उनसे पहाड़ी मिठाई सिंगोरी (पत्ते में लपेटी ताजा मावे की एक खास मिठाई) की मांग की थी।
कोरोनाकाल में वह मंगलेश तक यह मिठाई नहीं पहुंचा पाए थे। इसका उन्हें अब अफसोस हो रहा है। देहरादून के दर्शनलाल चौक पर स्थित युगवाणी का दफ्तर मंगलेश डबराल का अड्डा हुआ करता था। इसे देहरादून का मिनी जेएनयू कहा जाता है। मंगलेश जी और तमाम वामपंथी साहित्यकार वहां खूब चौकड़ी जमाते और साहित्य मंथन करते। संजय कोठियाल कहते हैं कि आज इस अड्डे का सबसे बड़ा महारथी चला गया।
मंगलेश डबराल का जाना हिंदी साहित्य की बड़ी क्षति: त्रिवेंद्र
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने रावत साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित, हिंदी भाषा के प्रख्यात लेख, कवि और पत्रकार मंगलेश डबकराल के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। उन्होंने मंगलेश डबराल के निधन को हिंदी साहित्य को एक बड़ी क्षति बताया। उन्होंने दिवंगत आत्मा की शांति व शोक संतप्त परिवार को धैर्य प्रदान करने की ईश्वर से प्रार्थना की।
उत्तराखंड और साहित्य को भारी क्षति : बलूनी
मंगलेश डबराल की बीमारी की खबर पाकर उनके इलाज की त्वरित व्यवस्था कराने वाले सांसद अनिल बलूनी उनके निधन से काफी आहत दिखे। उन्होंने इसे साहित्य जगत के साथ उत्तराखंड का भी भारी नुकसान बताया। उन्होंने बताया कि उनके इलाज के लिए अच्छी से अच्छी व्यवस्था की गई लेकिन होनी को जो मंजूर है, उसे कौन टाल सकता है। अनिल बलूनी ने बताया कि वह मंगलेश के परिवार के संपर्क में हैं और अंतिम संस्कार आदि की पूरी व्यवस्थाओं में लगे हैं।