जान बचाने और प्राथमिक उपचार के नाम पर दून पुलिस और 108 सेवा की एंबुलेंस हादसों में घायल होने वालों को निजी अस्पतालों में भर्ती करा रहे हैं।
घायल के अस्पताल पहुंचते ही निजी अस्पताल एडवांस पेमेंट की मांग करते हैं। नहीं देने पर इलाज करने से मना कर देते हैं।
यदि मरीज के साथ परिजन हुए और उनके पास पैसे हुए तो इलाज मिल पाता है, पर यदि मरीज के पास पैसे नहीं हुए तो इलाज तब तक नहीं मिल पाता जब तक कि पैसा नहीं जमा करा दिया जाता।
पुलिस और 108 सेवा के कर्मचारी भी मरीज को अस्पताल पहुंचाने तक ही अपनी जिम्मेदारी मानते हैं। इस तरह राजधानी देहरादून के निजी अस्पतालों में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है।
केस वन
12 नवंबर की रात जीएमएस रोड पर एक्सीडेंट में घायल एक युवक को पुलिस और 108 सेवा की एंबुलेंस सरकारी अस्पताल ले जाने के बजाय पास के एक निजी अस्पताल ले गए। अस्पताल ने मरीज को भर्ती करने से पहले ही एडवांस फीस जमा कराने को कहा।
मरीज की तरफ से पैसे नहीं होने की बात कही गई तो अस्पताल ने इलाज करने से मना कर दिया। परिजनों ने किसी तरह रात में पैसे जुटाकर अस्पताल को दिए तब जाकर इलाज शुरू हुआ। सुबह तक इतना बिल बना दिया गया कि परिजनों ने मरीज को दूसरे अस्पताल में भर्ती कराना ही बेहतर समझा।
केस टू
30 अक्तूबर को आराघर के समीप वाहन की टक्कर से जख्मी एक बाइक सवार को पुलिस हरिद्वार रोड स्थित एक निजी अस्पताल ले गई। कुछ देर बाद पहुंचे परिजनों को जब अस्पताल का चार्ज पता चला तो वह घायल युवक को दून अस्पताल ले गए। लेकिन महज एक घंटे में ही निजी अस्पताल ने इलाज के नाम पर मोटा बिल वसूल लिया।
पैसे के अभाव में न रुके इलाज
वकील संजीव शर्मा बताते हैं कि हादसों में घायलों को अस्पताल ले जाने के बारे में सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट गाइड लाइन है। आपात स्थिति में कोई भी अस्पताल या डॉक्टर पैसों के अभाव में मरीज का इलाज नहीं रोक सकता। ऐसा करना सुप्रीम कोर्ट के नियमों का उल्लंघन होता है।
सरकारी अस्पताल होनी चाहिए प्राथमिकता
नियमानुसार, किसी हादसे के घायल को सबसे पहले सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया जाना चाहिए। अगर वहां उसे समुचित इलाज न मिले तो हायर सेंटर रेफर किया जा सकता है। अगर घायल के परिजन चाहें तो ही उसे निजी अस्पताल में भर्ती कराया जाता है।
दुर्घटनाओं के मामले में घायल की जान बचाने के लिए प्राथमिकता यह रहती है कि सबसे नजदीक के अस्पताल में भर्ती कराया जाए। मामूली रूप से चोटिल होने पर घायल को सरकारी अस्पताल पहुंचाया जाता है।
- अजय सिंह, एसपी सिटी
घायल को सरकारी अस्पताल ले जाने का नियम है। अगर सरकारी अस्पताल दूर है तो घायल को निजी अस्पताल में प्राथमिक उपचार मिलना चाहिए। जिसका खर्च सरकार को वहन करना चाहिए। एसोसिएशन ने पिछले दिनों प्रमुख सचिव स्वास्थ्य के समक्ष मसले को उठाया था। लेकिन इस पर बात आगे नहीं बढ़ पाई।
- डॉ. डीडी चौधरी, महासचिव, आईएमए
क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट
पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति बनाम स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दे चुका है कि दुर्घटना में घायल या अन्य किसी इमरजेंसी मेडिकल कंडीशन में कोई भी अस्पताल मरीज को उपचार देने से मना नहीं कर सकता।
बाद के कई फैसलों में भी कहा गया है कि कोई भी अस्पताल या मेडिकल की प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाला व्यक्ति अस्पताल पहुंचने पर ऐसे मरीज की जान बचाने के लिए इलाज शुरू कर देगा, न कि पैसे जमा होने का इंतजार करेगा।
108 सेवा प्राथमिकता में मरीज को सरकारी अस्पताल ही ले जाती है। मरीज या परिजन के कहने पर ही निजी अस्पताल ले जाते हैं। इसके लिए परिजन से फार्म तक भरवाया जाता है। अगर मरीज की मर्जी के खिलाफ निजी अस्पतालों में जाने की शिकायत आएगी तो कार्रवाई की जाएगी।
- मनीष टिक्कू, स्टेट हेड 108-जीवीके ईएमआरआई